जींद। जैन स्थानक में प्रवचन करते हुए मुनि आदीश ने कहा कि आप अपने जीवन में अहंकार के साथ जीना चाहते हो या विनम्रता के साथ। जो लोग अहंकार में जीते है उनका विनाश हो जाता है। आप लंकापति रावण को पढ़कर देखिए कैसे अहंकार के कारण अपनी सोने की लंका खो ली और किस तरह विनम्रता से राम पुन: अयोध्या के राजा बन गए। अहंकार और विनम्रता में दिन रात का अन्तर है। अहंकारी व्यक्ति किसी की नहीं मानता और विनम्र व्यक्ति सबको साथ लेने की नीति में विश्वास करता है। आज परिवारों में जो झगड़े बढ़ रहे हैं, इसका मुख्य कारण अहंकार है। सास कहती है घर मेरे हिसाब से चलना चाहिए और बहू चाहती है मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी हूं। घर मेरे हिसाब से चलना चाहिए। हिसाब से घर का सारा हिसाब-किताब खराब हो जाता है। एक कुम्हार अपने बेटे को घड़े बनाना सीखा रहा था और काफी सीख भी गया, यहां तक पिता से ज्यादा अच्छे घड़े बनाने लगा फिर भी पिताजी उसके बनाए घड़े में कमी निकाल देता है। एक दिन बेटे ने पिता से कहा देखो पिताजी मेरे बनाएं घड़े आपसे बहुत अच्छे है और लोग ज्यादा पसंद करते है। आप ऐसे करो, अब अपनी कमी दूर करो, मेरी नहीं पिता जी ने कहा बेटा आपको जितना विकास करना था कर लिया अब इससे ज्यादा नहीं सीख पाओगे, क्योंकि अब आपको लगने लगा मैं सबसे अच्छा काम करता हूं कहने का अर्थ-अहंकार हमारे विकास को रोक देता है, रिश्तों को खत्म कर देता है। विनम्रता हमें आगे बढ़ाती है और रिश्तों को मधुरता प्रदान करती है। विनम्रता उस चिकनाई के सामान है जो रिश्तों को नरम रखती है। इस अवसर पर प्रधान राकेश जैन, विपुल जैन, रविंद्र जैन मौजूद रहे।