कलमवीर विचार मंच के तत्वावधान में होली के उपलक्ष्य में आयोजित आनलाइन काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता गुरुग्राम के वरिष्ठ साहित्यकार मदन साहनी ने की। संचालन हरियाणवी हास्य कवि सुंदर कटारिया ने किया। कार्यक्रम में शामिल रहे कवियों डॉ. रसिक गुप्ता, पुष्पलता आर्य,कल्पना ढोंढियाल, कृष्ण गोपाल विद्यार्थी, कुमार राघव, अनिल भारतीय व मोहित कौशिक ने शब्दों की पिचकारी से गीतों, गजलों व हास्य कविताओं के रंग बिखेर कर होली को और भी रंगीन बना दिया।
कुछ कविताओं के अंश प्रस्तुत हैं...
रंगों का त्योहार है होली
उमंग भरा उपहार है होली
ईष्र्या घृणा और द्वेष को
मार सको तो मारो गोली
- मदन साहनी, गुरुग्राम
जबसे हंसना-हंसाना सीखा है,
जिन्दगी में बड़ा उजाला है।
दोस्त अब क्या मेरा बिगाड़ेंगे,
दुश्मनों के भी मुंह पे ताला है।
-कृष्ण गोपाल विद्यार्थी,बहादुरगढ़
आओ जरा थोड़ा सा सम्भल जायेंं होली पर,
पानी की हर एक बूंद को बचायें होली पर।
रंगो के बिना तो रंगहीन है ये जिन्दगी,
नमकीन के संग नीट ही लगायें होली पर।
- सुंदर कटारिया,गुरुग्राम
रंग लगाओ भंग चढ़ाओ, मृदंग बजाओ कि आ गई होली,
रास रचाओ धूम मचाओ, मिलकर गाओ कि आ गई होली।
चौंक पुराओ अंग सजाओ, घर घर जाओ कि आ गई होली,
मेल बढ़ाओ प्यार जताओ,
सबको बताओ कि आ गई होली।
- कुमार राघव,बहादुरगढ़
मैं अपने मकान मालिक से बोला एक दिन लोग कहा करेंगे कि तुम्हारे मकान में एक बड़ा कवि रहता था/उस दिन तू पूरे मोहल्ले में छा जाएगा/मकान मालिक बोला अगर शाम तक किराया नहीं दिया/ तो वह दिन आज ही आ जाएगा ।
-डॉ. रसिक गुप्ता,दिल्ली
प्यार की होली रे होली,
गोरी की भीगी है चोली।
रंग गुलाबी, नैन शराबी,
गोरी बनी है रंगोली ।
प्यार की होली रे होली,,,
-अनिल भारतीय गुमनाम,बहादुरगढ़
बैठ ख़ुशी की डोली रे रसिया।
आई सबरंग होली रे रसिया ।
आओ भंग प्रेम की घोटें
भूलें अगली पिछली चोटें ।
जो होली सो हो ली रे रसिया
-पुष्पलता आर्य,चरखीदादरी
होश सँभालते ही मुसीबतो ने घेर लिया,
मेरे बचपने को घर की जरूरतों ने घेर लिया।
मुफलिसी में एक एक करके जुदा हुए थे जो,
पैसा आते ही उन रिश्तों ने उन दोस्तो ने घेर लिया।
- मोहित कौशिक, बहादुरगढ़
जैसे ही राधा ने रंगा कृष्ण को,
रंग गई धरा ये सारी।
रंग गया सुंदर हर पत्ता,
हर पुष्प और डारी डारी।
-कल्पना ढोंढियाल,दिल्ली
-फोटो 4 : ऑन लाइन कवि सम्मेलन में जुड़े कवि।
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