उचाना। शहर के प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी भारतेंदु शास्त्री ने कहा कि जो भीतर से शांत है उसके लिए बाहर भी सर्वत्र शांति ही है जिसका मन वश में नहीं है वही तो विवश है। यदि आपका मन शांत नहीं है तो हिमालय की शांति भी आपके जीवन को अशांत करने वाली प्रतीत होगी। अशांति कहीं और से नहीं आती भीतर से आती है। इसका जन्मदाता आपका मन ही है। जिसने मन को साध लिया वही तो साधु है। निरंतर अभ्यास से इस मन को नियंत्रित किया जा सकता है। पुजारी ने कहा कि मन न तो कभी तृप्त होता है और न ही एक क्षण के लिए शांत बैठता है। यह अभाव और दुख की ओर बार-बार ध्यान आकर्षित कराता रहता है। कभी कहीं आपको यथोचित सम्मान न मिला तो अकारण ही यह बार-बार अपमान होने का अहसास कराता रहेगा। मन सदैव अहम का पोषण चाहता है क्योंकि जहां मनुष्य के अहम को ठेस पहुंचती है, वहीं मन दुखी हो जाता है। मन को साध लेना ही तो जीवन की साधना भी है। संवाद