बहादुरगढ़/ झज्जर । छठ महापर्व के दूसरे दिन व्रतियों ने खरना मनाया। खरना का मतलब होता है शुद्धिकरण। इसे लोहंडा भी कहा जाता है। छठ पूजा का विशेष प्रसाद के तौर पर घरों में खीर बनाई गई। जाती है। मान्यता है कि जो भी व्रती छठ के नियमों का पालन करती हैं उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
20 नवंबर तक चलने वाले चार दिवसीय छठ पूजा महापर्व को लेकर बहादुरगढ़ में रह रहे हजारों पूर्वांचलवासियों में बेहद उत्साह है। खरना के दिन बाजारों में लोगों ने जमकर खरीददारी की। शहर की विभिन्न कॉलोनियों में रहने वाले प्रवासी श्रमिकों ने शनिवार को छठ पूजा की शुरूआत करते हुए खरना किया। खरना को लोहंडा भी कहा जाता है और खरना के दिन महिलाएं पूरे दिन व्रत रखती हैं, जो मन की शुद्धता के लिए किया जाता है। इस दिन छठी मैया के लिए प्रसाद तैयार किया जाता है। प्रसाद में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। खरना की शाम को गुड़ से बनी खीर का भोग लगाया। कुछ जगहों पर इस खीर को रसिया भी कहते हैं। बिहार के सिवान जिले के रहने वाली कलावती, उत्तर प्रदेश के बलिया की रहने वाली सुमन, गोपालगंज बिहार की सुमन और संजय ने बताया कि भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए छठ पर्व मनाया जाता है। व्रत में नारियल, अनानास, अदरक, शरीफा, गागल, अभरक, आंवला, सुपारी, लोंग, इलाइची, चावल, मटर, ईख, टोकरी और छाज आदि वस्तुओं का इस्तेमाल होता है। व्रत के समापन होने पर गुड़ और आटे का देशी घी से ठेकुआ बनाया जाता है।
-रविवार को अस्ताचल व सोमवार को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देंगे
रविवार को अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने का समय शाम 5 बजकर 26 मिनट है जबकि सोमवार को उदीयमान सूर्य को सुबह 6 बजकर 47 मिनट है। इस समय ही सूर्य को अर्घ देना शुभ बताया जा रहा है। इसके लिए जोरशोर से तैयारी चल रही है। घाटों पर बड़ी संख्या में लोग पहुंचेंगे और पूजा अर्चना करेंगे।
तालाब में उतरकर करते हैं पूजा
व्रतधारियों ने अपना चूल्हा अलग रखा और अरवा चावल, चने की दाल व लौकी की सब्जी का सेवन किया। हरिकरण ने कहा कि यह पर्व बहुत कठिन पर्व है। 4 दिन तक चलने वाले इस पर्व में निर्जला व्रत भी रखना होता है। दूसरे दिन व्रती खरना करते हैं। तीसरे दिन की शाम को व्रती पानी के घाट या तालाब में उतरते हैं और ढलते सूरज को अर्घ्य देते हैं। पर्व के अंतिम दिन यानी अब 20 नवंबर की सुबह उदीयमान सूरज को अर्घ्य देकर मन्नतेंं मांगी जाएंगी। इसके बाद यह पर्व संपन्न हो जाएगा।
ठेकुआ है जरूरी
छठ के प्रसाद में गेहूं के आटे से बना ठेकुआ प्रमुख प्रसाद होता है। इसके बिना छठ पूजा अधूरी मानी जाती है। इसके अलावा चावल के आटे से कसार बनाया जाता हैं। प्रसाद का सारा सामान बहुत साफ सफाई से बनाया जाता है। प्रकृति से जुड़े हुए फल चढ़ते हैं। जैसे गन्ना, घाघर नीबू, मूली, कच्ची हल्दी, केला, शकरकंद और पानी फल सबसे महत्वपूर्ण है। छठ के शाम वाले पहले अर्घ्य वाले दिन प्रसाद बनाने का काम शुरू होता है। दूसरे दिन सूप में प्रसाद रखा जाता है। फिर इसे दौउरा में पूजा का सामान रखकर पुरुष उसे अपने सिर पर लेकर घाट तक पहुंचाते हैं।
झज्जर।