एक तरफ जहां सरकार डाक विभाग के आधुनिकीकरण की पुरजोर कोशिश कर रही है। वहीं इस विभाग की घोर लापरवाही का नया उदाहरण सामने आया है। डाकघर के डाकिया ने रजिस्टर्ड पत्र को भी बांटने से साफ मना कर दिया। निकटवर्ती गांव छारा के निवासी रिटायर्ड प्रोफेसर बी.के. भारद्वाज ने अपने गांव के शिव मंदिर मार्ग पर विद्यमान कूड़े के ढेरों की सफाई करवाने के बारे में बहादुरगढ़ के उपमंडल अधिकारी को रजिस्टर्ड डाक से गत 9 सितंबर को पत्र लिखा। उनको उस समय बड़ी हैरानी हुई जब पंद्रह दिन बाद 24 सितंबर को उनका वह पत्र डाक विभाग ने इस टिप्पणी के साथ वापिस भेज दिया कि संबंधित डाकिया द्वारा उसे वितरित करने से मना कर दिया गया है। जब उन्होंने इस बारे में अपने स्तर पर जानकारी प्राप्त की तो पता चला कि डाक वितरण के क्षेत्र के विभाजन के विषय में बहादुरगढ़ के डाकियों में बड़ा असंतोष है। बहादुरगढ़ के प्रशासनिक कार्यालय बालौर गांव के निकट शिफ्ट हो गए हैं। वहां का डाकिया अस्थाई तौर पर कार्यरत होने के कारण अपने क्षेत्र के दायरे को बढ़ाने पर आपत्ति करता है। सवाल यह उठता है कि इस तरह की स्थिति में पत्रों को भेजने वाले के पते पर वापिस लौटाए जाने का क्या औचित्य है, क्योंकि एक उपभोक्ता के नाते यह किसी भी व्यक्ति का यह वैधानिक अधिकार है कि उसकी डाक का सही वितरण हो।