साहब! मैं तो मजदूरी कर घर लौट रहा था कि हो हल्ला करते हुए उपद्रवी छावनी में घुस आए। कुछ ही देर में चारों तरफ चीख पुकार मच गई। उपद्रवियों ने देखते ही देखते मेरे सामने मेरे पिता को मार डाला।
मैं जब तक कुछ समझ पाता और बचाने के लिए आता तब तक फायरिंग शुरू कर दी। मैं वहां से भागा, मेरी जान तो बच गई, लेकिन अब मैं अपने आप से नजरें नहीं मिला पा रहा हूं।
उपद्रवियों ने मुझे और मेरे परिवार को जो दर्द दिया, उसको स्वास्थ्य अधिकारी अब हरा करने के लिए आ रहे हैं। मंगलवार को अपना दर्द बयां करते छावनी मोहल्ले का हरीश रो पड़ा।
लेकिन जब बात प्रशासन के सहयोग की आई तो नम आंखें गुस्से में लाल हो गई। बोला पुलिस को सूचना दी, लेकिन वह बचाने नहीं पहुंची। हरीश के पिता कृष्ण कुमार की रविवार को जातीय दंगे में मौत हुई है।
हरीश ने कहा कि आरक्षण की आग तो धीरे-धीरे बुझ जाएगी, लेकिन मेरे परिवार को मिला जख्म अब जिंदगी भर नहीं भर सकेगा।
हरीश ने बताया कि हम चिल्लाते रहे कि हम तो मजदूर हैं, लेकिन उपद्रवियों ने रहम नहीं खाया। भीड़ में उनकी आवाज को सुनने वाला कोई भी नहीं था।
कहा, इलाज में भी प्रशासन ने नहीं दिया सहयोग
छावनी पर हमला हुआ, घायलों को इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया, लेकिन वहां प्रशासन मुफ्त इलाज की सुविधा भी नहीं दिला पाया।
हरीश ने बताया कि कभी एक्सरे के लिए तो कभी अन्य वस्तुओं के लिए। तीसरे दिन भी डॉक्टरों ने उनके शरीर में लगे गोली के छर्रे नहीं निकाले। एक्सरे करा चुके हैं, पर इलाज को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा। अब जख्मों पर नमक छिड़का जा रहा है।