डॉ. सत्यवान सौरभ के अनुसार चुनावी बॉन्ड योजना को निरस्त करने का सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला लोकतंत्र को मजबूत बनाने में मील का पत्थर बन सके, इसके लिए पार्टियों और नेताओं द्वारा पारदर्शी फंडिंग पर अमल जरूरी है। फंडिंग पर जोर कम होने से धन के बजाय कार्यकर्ताओं का मान बढ़ेगा।
चुनावी बॉन्ड लागू होने से पहले पुरानी कानूनी व्यवस्था के अनुसार, कंपनियां सालाना मुनाफे की अधिकतम सीमा के अनुसार ही दान दे सकती थीं। लेकिन कानून में बदलाव के बाद घाटे वाली कंपनियां भी बॉन्ड के माध्यम से पार्टियों को चंदा देने की हकदार हो गईं थी। मतदाताओं और पार्टियों को चुनावी बॉन्ड देने वाले की जानकारी नहीं मिल सकती थी।
लेकिन सरकार को स्टेट बैंक के माध्यम से ये सारी जानकारियां हासिल हो जाती थीं। कहा जा रहा था कि निजी कंपनियां और कॉरपोरेट लोग चुनावी बॉन्ड में पैसा लगाकर सरकारों से अपने हित में अनुचित काम कराते रहे हैं।
चुनाव आयोग ने ऐसे बॉन्ड और विदेशों से मिल रहे चंदे पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। रिजर्व बैंक ने भी इन बॉन्ड के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग होने की आशंका जाहिर की थी। केंद्र और राज्य सरकारों को चुनावी बॉन्ड में विशेष बढ़त मिलती है, इसलिए इस योजना को जजों ने समानता के विरुद्ध माना है। भारत में लॉबिंग गैर-कानूनी है, लेकिन चुनावी बॉन्ड के माध्यम से निजी कंपनियां सरकारों से अनुचित लाभ ले रही थी। चुनाव में नियमों का उल्लंघन करके प्रत्याशी बड़े पैमाने पर काले धन का चुनावों में इस्तेमाल करते हैं।
इसके अलावा, सभी पार्टियों को कानूनी और गैर-कानूनी तरीके से चंदा मिलता है। पार्टियों के संगठित पैसे से कॉरपोरेट ऑफिस, चार्टर्ड फ्लाइट, रोड शो, रैलियां और नेताओं की खरीद-फरोख्त भी होती है। बोहरा कमेटी की रिपोर्ट में नेता, अपराधी और कॉरपोरेट लोगों की मिलीभगत को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा संकट माना गया था। दिवालिया कानून की आड़ में अनेक कंपनियां सरकारी बैंकों का पैसा हजम कर रही हैं। ऐसी कंपनियों को चुनावी बॉन्ड की आड़ में फंडिंग की इजाजत देना देश के खजाने की लूट ही मानी जाएगी।
विशेषज्ञ की राय
जैसा कि अब्राहम लिंकन ने कहा था, लोकतंत्र वह है जो जनता के द्वारा जनता के लिए जनता द्वारा चुना जाता है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए यह नियम मील का पत्थर साबित होगा। इससे लोगों और नेताओं के बीच पारदर्शिता रहेगी और और कार्यकर्ताओं को मान भी बढ़ेगा। चुनावों में नियमों का उल्लंघन करते प्रत्याशी गैर कानूनी तरीके से बड़े पैमाने पर काले धन का चुनावों में इस्तेमाल करते हैं। निजी कंपनियां और कॉर्पोरेट जगत के लोग चुनावी ब्रांड में पैसा लगाकर सरकार से अपने हित में अनुचित व गैर कानूनी कार्य वह अपने निजी स्वार्थ के लिए सरकार से करवाते हैं। जिससे अपराध, मारामारी, आपसी झगड़े, भुखमरी और आंदोलन का रूप ले लेते हैं। इससे वे सरकारी संपत्ति निजी संपत्ति अर्जेंसी को नुकसान पहुंचता है। जिससे आम जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है। यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। वर्तमान परिपेक्ष में हमें जरूरत है कि लोकतंत्र को समृद्ध और मजबूत बनाने के लिए लोकतांत्रिक परंपराओं को अंगीकार करने की जरूरत है।
यह भी जानें
भारत सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी। इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी 2018 को कानूनन लागू कर दिया था। इस योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक राजनीतिक दलों को धन देने के लिए बॉन्ड जारी कर सकता है। इन्हें ऐसा कोई भी दाता ख़रीद सकता है, जिसके पास एक ऐसा बैंक खाता है, जिसकी केवाईसी की जानकारियां उपलब्ध हैं। इसमें भुगतानकर्ता का नाम नहीं होता है।