डॉ. सत्यवान सौरभ, बड़वा, सिवानी
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डॉ. सत्यवान सौरभ के अनुसार 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से, बलूचों के प्रति तेहरान के कठोर व्यवहार ने सीस्तान-ओ-बलूचिस्तान में सुन्नी कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया है। ईरानी क्रांति से पहले भी, ईरान से बलूच बलूचिस्तान और कराची चले गए। वे ईरान के शाह के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो गए। पिछले कुछ वर्षों में बलूच विद्रोह में वृद्धि के कारण पाकिस्तान का अपनी बलूच आबादी के साथ संबंध जटिल हो गया है।
बलूच समाज संगठित रहने वाला है लेकिन अंदरूनी कलह ने समूह की राजनीतिक शक्ति की कमी में कुछ हद तक योगदान दिया है, जैसा कि सदियों से विभिन्न साम्राज्यों के अधीन रहा है। बलूच अलगाववादी आंदोलन दशकों से इस क्षेत्र के राजनीतिक ताने-बाने का हिस्सा रहे हैं, जो पाकिस्तान और ईरान दोनों में मौजूद हैं, जहां लगभग 20 प्रतिशत बलूच आबादी रहती है (लगभग 70 प्रतिशत पाकिस्तानी क्षेत्र में हैं)। दोनों देशों के बीच बढ़ती छिद्रपूर्ण और खराब पुलिस वाली सीमा का मतलब है कि मादक पदार्थों की तस्करी और कई अलग-अलग विद्रोही समूहों को पनपने का मौका मिला है, वैले ने विशेष रूप से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के बीच सहयोग पर ध्यान दिया है, जो पाकिस्तानी सरकार को उखाड़ फेंकना चाहता है और वहां कई घातक हमले किए।
ग्वादर और चाबहार के कारण दोनों देशों के आर्थिक हितों के साथ-साथ उग्रवादी विचारधारा में बदलाव, खाड़ी देशों और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ पाकिस्तान के बढ़ते सहयोग और लंबी सीमा की चुनौतीपूर्ण स्थितियों ने दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा दिया है। अंततः, ईरान और पाकिस्तान के बीच वर्तमान संघर्ष का दोनों देशों की आंतरिक राजनीति से काफी अधिक लेना-देना है। यह एक जातीय विद्रोह के खिलाफ लंबे समय से चल रहे संघर्ष की निरंतरता है, जिसने उन दोनों को दशकों से परेशान किया है।
वहीं ईरान की भागीदारी विशेष रूप से पाकिस्तानी क्षेत्र के साथ-साथ इराक और सीरिया के ठिकानों पर हमला करने का उसका निर्णय, उसकी युद्धक्षेत्र क्षमताओं के साथ-साथ अपने ही लोगों पर हाल के हमलों के बारे में उसकी चिंता को भी दर्शाता है। यह स्थिति तब तक तनावपूर्ण रहने की संभावना है, जब तक कि दोनों देश अपनी-अपनी बलूच आबादी के साथ व्यवहार पर पुनर्विचार नहीं करते।
विशेषज्ञ की राय
इस मुद्दे पर इनकी अच्छी पकड़ है। लेख में तथ्यों का संपूर्ण समावेश है। हालांिक, सोच का दायरा और बढ़ाने की जरूरत है। ईरान और पाकिस्तान के बीच बहुत मैत्रीपूर्ण संबंध थे। उदाहरणार्थ, ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले, दोनों देश के संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ मजबूत संबंध थे। फिर भी दोनों देश अंतरधार्मिक विचारों के विपरीत छोर पर है, पाकिस्तान में सुन्नी बहुसंख्य जबकि ईरान में शिया बहुसंख्य है। इसके अलावा रणनीतिक संबंधों, भू-राजनीतिक मतभेद, अफगानिस्तान संघर्ष और युद्ध संदर्भ के मतभेद ने ईरान और पाकिस्तान के बीच अविश्वास व मतभेद और गहरा कर दिया। विभिन्न देशों में रहने के बावजूद, बलूच जातीय-राष्ट्रवाद ने उनके बीच गहरे संबंध और एकता को बढ़ावा दिया है। ईरान-पाकिस्तान सीमा, लगभग 900 किलोमीटर, जिसे गोल्डस्मिथ लाइन के नाम से जाना जाता है। करीब 90 लाख संजातीय बलूच लोग सीमा के दोनों ओर रहते है। ईरान और पाकिस्तान दोनों में बलूचों की राजनीतिक और आर्थिक उपेक्षा हुई है और ये जाति हाशिए पर है। बलूच लिबरेशन आर्मी और बलूच लिबरेशन फ्रंट जैसे समूह दोनों देशों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में शामिल रहे हैं। पाकिस्तान व ईरान के बीच बढ़ते तनाव के निहितार्थ बहुआयामी हैं। - डॉ. विजेंद्र सिंह बेनीवाल, विभागाध्यक्ष, लोक प्रशासन, राजकीय महिला महाविद्यालय, हिसार
बलूचिस्तान में उग्रवाद - एक साझा समस्या : बिदामो देवी
बलूच जनजाति बलूचिस्तान क्षेत्र के लोगों का एक समूह है और यह क्षेत्र तीन क्षेत्रों में विभाजित है। उत्तरी भाग वर्तमान अफगानिस्तान में है, पश्चिमी क्षेत्र ईरान में सिस्तान-बलूचिस्तान क्षेत्र कहलाता है और शेष पाकिस्तान में है। ब्रिटिश शासन के दौरान और उसके बाद भी यह क्षेत्र सत्ता संघर्ष का केंद्र रहा। पाकिस्तान ने 1948 में इस क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया और विलय समझौते के कारण स्वायत्तता के लिए पहला विद्रोह हुआ, जिसके परिणामस्वरूप बलूचिस्तान में हिंसा के साथ स्वतंत्रता आंदोलन का प्रणालीगत दमन हुआ। बलूच लोगों का मानना है कि वे विभाजन के दौरान पाकिस्तान द्वारा उपनिवेशित या कब्जा कर लिए गए थे और जातीय समूह प्रमुख पंजाबियों, सिंधियों से अलग है, जो पाकिस्तान की राजनीति पर हावी रहे हैं। पश्तून क्षेत्र का अफगानिस्तान के साथ जुड़ाव और आजादी की मांग कर रहे बलूच लोगों का पाकिस्तान के लिए 'अकिलीज़ हील' बन गया है। बावन साल पहले, पूर्वी पाकिस्तान में आजादी के आह्वान के कारण बांग्लादेश का निर्माण हुआ। बलूच सशस्त्र समूह इस क्षेत्र को मुक्त करने के लिए बनाए गए थे और पाकिस्तानी सेना और आतंकवादियों के बीच कई बार झड़प हुई है। समूहों ने क्षेत्र में परियोजनाओं में बाधा डालने और भय की स्थिति पैदा करने के लिए बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाया है। सीमा के दोनों ओर बलूच लोगों के बीच अधीनता की साझा भावना है। बलूची राष्ट्रवाद की भावना पैदा की जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता है और सत्ता शून्यता तथा राज्य और लोगों के बीच बढ़ती शत्रुता के कारण नशीली दवाओं और हथियारों की तस्करी का केंद्र भी है। अतीत में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब ईरान ने बलूचिस्तान में आतंकवादी शिविरों पर हमला करने के लिए मोर्टार दागे हैं। ईरान-पाकिस्तान सीमा पर एक बाड़ अब परिवारों और जनजातियों को अलग करती है, जो अभी भी जारी है। अपने रणनीतिक महत्व के बावजूद, बलूचिस्तान को पाकिस्तान के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया है, जिससे एक स्वतंत्रता आंदोलन को बढ़ावा मिला है जो 1948 में पाकिस्तान में शामिल होने के बाद से शुरू हुआ था। हाल के हमलों ने दो चीजों पर ध्यान आकर्षित किया है - एक परमाणु-सशस्त्र राष्ट्र के हवाई क्षेत्र का मिसाइल और ड्रोन हमलों से उल्लंघन किया गया और बलूचिस्तान में अस्थिरता और क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों से जुड़ी सत्ता की राजनीति। -बिदामो देवी, आकाशवाणी हिसार उद्घोषिका, लुदास, हिसार
-प्रियंका सौरभ, आर्यनगर, हिसार
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बलूचिस्तान मुद्दा, क्षेत्रीय शक्ति और सुरक्षा के बारे में स्थापित धारणाओं को चुनौती : प्रियंका सौरभ
हाल की घटनाओं ने ईरान और पाकिस्तान के बीच संबंधों को सुर्खियों में ला दिया है, मिसाइल हमलों, ड्रोन हमलों और क्षेत्रीय विवादों से दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव बढ़ गया है। ईरान-पाकिस्तान सीमा के दोनों ओर रहने वाली बलूच आबादी गहरे सांस्कृतिक, जातीय और भाषाई संबंध साझा करती है। दोनों देशों में बलूच समुदायों को हाशिए पर धकेल दिया गया है, जिससे अलगाववादी आंदोलन को बढ़ावा मिला है। बलूच विद्रोही खुली सीमा के पार काम करते हैं, सैन्य और नागरिक लक्ष्यों को निशाना बनाते हैं, जिससे रिश्ते जटिल हो जाते हैं। ईरान में बलूच विद्रोहियों का झुकाव अक्सर धार्मिक होता है, जबकि पाकिस्तान में विद्रोहियों का झुकाव धर्मनिरपेक्ष जातीय-राष्ट्रवाद की ओर होता है। 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति से पहले, दोनों देश संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ जुड़े हुए थे और बगदाद संधि (बाद में सेंटो) का हिस्सा थे, जो नाटो पर आधारित एक सैन्य गठबंधन था। ईरान ने 1965 और 1971 में भारत के खिलाफ युद्ध के दौरान पाकिस्तान को सामग्री और हथियार सहायता प्रदान की। 1979 के बाद ईरान संयुक्त राज्य अमेरिका का कट्टर दुश्मन बन गया, जबकि पाकिस्तान अमेरिका के करीब आ गया, विशेषकर 9/11 के बाद आतंकवाद पर युद्ध के दौरान मतभेद उभरे। ईरान और पाकिस्तान के बीच हालिया सीमा पार हमले और तनाव उनके संबंधों की नाजुकता को रेखांकित करते हैं, जो ऐतिहासिक, सांप्रदायिक और भू-राजनीतिक कारकों से जटिल हैं। बलूचिस्तान मुद्दे में अरबों, इस्राइलियों और ईरानियों की भागीदारी व्यापक क्षेत्रीय शक्ति राजनीति को दर्शाती है। खाड़ी के मुहाने पर बलूचिस्तान का स्थान इसे भू-राजनीतिक रणनीतियों का अभिन्न अंग बनाता है। बलूचिस्तान मुद्दा, क्षेत्रीय शक्ति गतिशीलता और मध्य पूर्व में भारत की उभरती भूमिका इस क्षेत्र में सुरक्षा के बारे में स्थापित धारणाओं को चुनौती दे रही है। जैसे-जैसे खाड़ी के संघर्ष बलूच सीमा तक फैलते हैं, कमजोर पाकिस्तान खुद को मध्य पूर्व के व्यापक संघर्ष में उलझता हुआ पा सकता है, जो क्षेत्रीय रणनीतियों के पुनर्मूल्यांकन की मांग कर रहा है। -प्रियंका सौरभ, आर्यनगर, हिसार
- पवन कुमार, सातरोड़
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बलूचिस्तान में रहने वाले लोग पाकिस्तान से बहुत दुखी थे। वे इससे बहुत परेशान थे क्योंकि बलूच लोगों पर पाकिस्तान की सेना बहुत अत्याचार करती थी। जिस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं देता था। इसलिए पाकिस्तान के लोगों ने लोगों का ध्यान लाने के लिए लंदन में आंदोलन किया था। लेकिन फिर भी कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई। इसलिए हमें चाहिए कि बलूच लोगों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएं नहीं तो यह एक युद्ध में बदल जाएगा। जिसका एक अच्छा उदाहरण श्रीलंका का गृहयुद्ध है। किसी भी गृहयुद्ध का प्रभाव भारत में पड़ता है। अगर वह देश भारत का पड़ोसी देश हो। क्योंकि कई लोग भारत में शरणार्थी बनकर रहने लग जाते हैं। इससे भारत की आंतरिक सुरक्षा खतरेे में पड़ सकती है। यह एक देश के लिए भी अच्छा नहीं होेता है। इससे उस देश का विकास रुक जाएगा और व्यक्ति मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस जाएगा। जितना हो सके उतना हमें इस समस्या को हल करने का प्रयत्न करना चाहिए। - पवन कुमार, सातरोड़
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विषय प्रतियोगी बच्चों में बढ़ता अवसाद (अंतिम तिथि- 4 फरवरी)
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पाकिस्तान की 69 लाख जनसंख्या बलूच है। ईरान में लगभग 20 लाख जनजातीय बलूच हैं और पूर्वी सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत की अधिकांश आबादी बलूच की है। वहीं 6 लाख की बलूच आबादी दक्षिणी अफगानिस्तान में रहती है। बता दें कि बलूचिस्तान अपने लंबे तटीय क्षेत्र के लिए जाना जाता है जो कराची से सोनमियानी, ओरमारा, कलमत, पसनी, ग्वादर, जिवानी और ईरान तक फैला हुआ है।