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युवा नजरिया: शिक्षा प्रणाली में सुधार और रोजगार के उत्तम अवसर देकर भारत बन सकता है विश्वगुरु

Thu, 11 Jan 2024 12:42 AM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)

सार

प्रतिभागी विद्यार्थियों के लिए अमर उजाला की ओर से शुरू ‘युवा नजरिया’ कॉलम के लिए कई आलेख प्राप्त हुए। ‘भारत के विश्वगुरु बनने की राह में चुनौतियां ’ विषय पर मिले आलेखों का मूल्यांकन राजकीय महिला महाविद्यालय, हिसार के प्राचार्य प्रो. रमेश आर्य ने किया। उन्होंने चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जींद के पत्रकारिता विभाग के छात्र सौरभ परुथी के आलेख को बेहतर माना है।
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सौरभ परुथी, छात्र, जन संचार विभाग, सीआरएसयू, जींद। प्रो. रमेश आर्य, प्राचार्य - फोटो : स्वयं
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विस्तार
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भारत को हम विश्वगुरु बनाने की कल्पना करते हैं। बात ठीक भी है, विश्वगुरु बनाने की बात आखिर करें भी क्यों न। प्राचीनकाल से वर्तमान समय तक भारत ने संपूर्ण जगत का गुरु की तरह ही मार्गदर्शन किया है। भारत ने विश्व को शून्य दिया, योग दिया। वसुधैव कुटुंबकम की प्रेरणा पर चलते हुए संपूर्ण विश्व को कोरोना काल में वैक्सीन मुहैया कराई।

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ये सब भारत के विश्वगुरु होने के संकेत हैं। भारत में दुनिया की सबसे ज्यादा जनसंख्या है, जिसके आधार पर हम दुनिया में भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना देख रहे हैं। परंतु आज के समय में इन युवाओं का देश से पलायन दूसरे देशों में हो रहा है। जो बेहद चिंतनीय है और इस दिशा में प्रमुख चुनौतियों में से एक है।

वर्ष 2023 में 10 महीनों में युवाओं ने पढ़ाई के लिए एक लाख 10 हजार करोड़ के लोन लिए हैं। इसमें से 37 प्रतिशत लोन विदेश में पढ़ने के लिए हैं। भारत के युवाओं का इस तरह से विदेश में जाना सही भी है। परंतु यहां उनकी ऊर्जा से हमें जो कार्य करने चाहिए थे, जिससे देश को उन्नति करने में सहायता मिलती इसकी कमी रहेगी। आज ज्यादातर युवा भारत में रोजगार के बजाय विदेशों में रोजगार के लिए जा रहे हैं। अगर ये निरंतर जारी रहा तो भारत की अर्थव्यवस्था कैसे मजबूत नजर आएगी।
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दूसरी चुनौती सामने आती है शिक्षा प्रणाली को लेकर। हालांकि, नई शिक्षा नीति में इसके सुधार की बात कही गई है। लेकिन इस समय यहां के विद्यार्थियों पर शिक्षा का बोझ इस प्रकार है कि सुबह स्कूल तो शाम को ट्यूशन का दबाव। माता-पिता और सामाजिक दबाव के चलते उन्हें सिर्फ किताबी ज्ञान प्राप्त होता है। उनमें व्यावहारिक ज्ञान की कमी है। इस दबाव के चलते भारत में बहुत छात्रों ने आत्महत्याएं की हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के वर्ष 2023 में जारी आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2022 के बीच भारत में कुल 7,62,648 आत्महत्याएं हुई हैं, जिनमें से 59,239 छात्र रहे अर्थात 7.76 फीसदी। ये जाहिर करता है कि हमें किस प्रकार के सुधार की जरूरत है। ये कुछ चुनौतियां थीं। हम शिक्षा प्रणाली में सुधार कर और यहां के लोगों में व्यावहारिक ज्ञान, उत्तम रोजगार के अवसर प्रदान कर विश्वगुरु बनने के लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं।

विशेषज्ञ की राय
युवाओं में लेखन क्षमता बढ़ाने का अमर उजाला का यह प्रयास अत्यंत ही सराहनीय है। चयनित लेख में इतिहास के तथ्यों को समेटने का प्रयास किया गया है। भाषा का स्तर ठीक है। लेखन में प्रवाह होने के कारण इसे चुना गया है। आज का भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक युवा राष्ट्र होने के साथ-साथ प्राचीन काल से ही गौरवशाली संस्कृति व सभ्यता, सामाजिक आदर्शों व मूल्यों से परिपूर्ण रहा है। यही नहीं आध्यात्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक व सहिष्णुता की धरोहर से समृद्ध, समावेशी, निष्पक्ष शासन संरचनाओं का तरफदार के साथ-साथ शांति और अहिंसा के दर्शन का समर्थक भी है।

पर्यावरण संरक्षण में टिकाऊ प्रथाओं और प्रयासों का संवाहक, वैश्विक स्वास्थ्य एवं गरीबी उन्मूलन का प्रेरक, विविधताओं में एकता के लिए विश्व भर में लोकप्रिय, गणित, खगोल विज्ञान, योग और ध्यान में भी अग्रणी देश रहा है। प्रकृति परिवर्तनशील है। हम मानते हैं कि भारत गत दो–तीन शताब्दियों में कुछ विचलित हुआ है, लेकिन वर्तमान में अपने उच्च कोटि की गुणवत्तापरक नई शिक्षा नीति, कौशल विकास, ऊर्जा विकल्पों में अनुसंधान, नवाचार और प्रौद्योगिकी में निवेश, गुलामी की मानसिकता को भुलाकर सतत आर्थिक वृद्धि और समृद्धि की राह चल रहा है।

अपनी भाषा और संस्कृति को अपना कर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार संबंधों को मजबूत करके, मानव संसाधनों का प्रबंधन, पूर्ण कर्तव्यनिष्ठा और सेवा भावना से श्रेष्ठता की आेर अग्रसर है। कूटनीतिक अंतरराष्ट्रीय मेलजोल की वकालत करके, प्रतिभा पलायन पर अंकुश लगाकर और धार्मिक सद्भाव के माध्यम से भविष्य में खुद को फिर से विश्व गुरु बनने के अपने दृष्टिकोण को ताकतवर व आकर्षक तरीके से रखने की आेर अग्रसर है। मेरा विश्वास है कि भारत अपने गौरवशाली इतिहास को दोहराएगा और विश्वगुरु के रूप में खुद को स्थापित करेगा। -प्रो. रमेश आर्य, प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय बरवाला, राजकीय महिला महाविद्यालय, हिसार।

- सुनीता, कीर्ति नगर, भिवानी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हमें अधिक विशेषज्ञता की आवश्यकता: सुनीता
भारत, एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर से समृद्ध राष्ट्र है, लेकिन विश्वगुरु बनने की राह में कई चुनौतियां आती हैं। पहली चुनौती है शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और पहुंच की समस्याएं। अधिकांश लोगों को उच्च शिक्षा तक पहुंचने में कठिनाई होती है और यह एक अधीनस्थ जनता के बीच असमानता उत्पन्न करता है। दूसरी चुनौती है तकनीकी और अनुसंधान क्षमता में कमी। विश्वभर में उच्च गुणवत्ता और नवाचारी तकनीकी उत्पादों का निर्माण करने के लिए हमें अधिक विशेषज्ञता की आवश्यकता है।

तीसरी चुनौती है जनसंख्या की बढ़ती हुई संख्या और रोजगार की कमी। भारत में बढ़ती जनसंख्या एक सशक्त श्रम बाजार बना सकती है, लेकिन इसका प्रबंधन करना भी महत्वपूर्ण है। अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास करना भी महत्वपूर्ण है। इन चुनौतियों का सामना करके, हमें शिक्षा, तकनीक, और रोजगार के क्षेत्र में सुधार करना होगा ताकि हम विश्वगुरु बन सकें। सरकार, शिक्षा निगम, और विश्वविद्यालयों को मिलकर काम करना होगा ताकि हमारा राष्ट्र विकास की ऊंचाइयों को छू सके और विश्वभर में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके।  

- डॉ. सत्यवान सौरभ, बड़वा, भिवानी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
देश की क्षीण होती आशाएं कैसे विश्वगुरु बनने के सपनों को साकार करेंगी : डॉ. सत्यवान सौरभ
हालात देख क्या हम कह सकते है कि भारत फिर एक बार विश्वगुरु बन सकता है। विश्वगुरु यानी विश्व को पढ़ाने वाला शिक्षक या विश्व को अंधकार से प्रकाश की और ले जाने वाला मार्गदर्शक। सच्चाई ये है कि आज हम सिर्फ विकसित देशों की नकल कर अपनी बहुमूल्य, गौरवशाली सभ्यता, संस्कृत और शिक्षा का इतिहास भूल गए हैं। स्वतंत्रता के बाद कमजोर सरकार और स्वार्थी नेतृत्व ने देश की नींव को खोखला कर दिया। इसके परिणामस्वरूप देश गुलामी की जंजीरों में वैसे ही जकड़ी रही। जो खुद गुलाम हो वो दूसरों को क्या दे सकता है। कहीं न कहीं देश का हित सोचने वाले लोगों के द्वारा देश और इसकी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की कोशिश की गई, लेकिन धीरे-धीरे देश के नेता अपने वोट बैंक के लिए देश को धर्म, जाति में विभाजित करते गए, अपना स्वार्थ साधने लगे और जनता के पैसे अपनी तिजोरियों में भरने लगे।

सरकार परिवारवाद तक सीमित हो गई और नेता जातिवादी हो गए। सरकारी तंत्र को घूसखोरी रूपी दीमक लग गया और सरकारी अधिकारी भ्रष्ट होते चले गए। नई पीढ़ियां सिर्फ़ पढ़ लिख कर बड़ी-बड़ी उपाधियां ग्रहण कर सिर्फ पैसे कमाने में लग गई और अपनी संस्कृति, सभ्यता को भूल पश्चिमी सभ्यता में डूब गई। इसका मूल कारण हमारी शिक्षा रही जो अंग्रेजों ने हमें शिक्षा दी, वही शिक्षा हमको आजादी के बाद भी प्राप्त हो रही है। इससे देश का गौरवशाली इतिहास खो गया और नई पीढ़ी को देश से, देश की संस्कृति से कोई प्यार नही रहा। दूसरी तरफ देश के दुश्मन देश को अंदर से खोखला ओर तोड़ने में लग गए। कानून अमीरों, सत्ताधारियों और समर्थ वान लोगों के घर की जागीर बन गया। और देशद्रोहियों को पनाह देने लगा। जो स्थिति आज देश में बन गई है वह संकेत नकारात्मक है। फिलहाल अभी हमें एक क्षीण- सी आशा की किरण भी दिखाई नहीं दे रही है। जो हमारे विश्वगुरु बनने के सपनों को साकार कर सकें।

मोनम बिश्नोई , शिव कॉलोनी, मंडी आदमपुर - फोटो : स्वयं
पूरी दुनिया बेहतर भविष्य के लिए भारत की ओर उम्मीद से देख रही: मोनम बिश्नोई , शिव कॉलोनी, मंडी आदमपुर
वो जो पूरे विश्व को राह दिखाए। पिछले कुछ समय में चाहे वो कोरोना महामारी का समय हो, रूस-यूक्रेन युद्ध, इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष हो या फिर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अपनी आवाज को मुखर तरीके से पेश करना, भारत ने हमेशा एक विश्व गुरु की भूमिका निभाई है। आज पूरी दुनिया बेहतर भविष्य के लिए भारत की ओर उम्मीद से देख रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भले ही हमारी एक अलग पहचान बन रही है, पर देश के अंदर अब भी कुछ चुनौतियां विद्यमान है। इनका समाधान निकाले बिना भारत विश्व गुरु नहीं बन सकता।

1. शिक्षा की रट्टा पद्धति : वेदों से स्वयं ज्ञान अर्जित करने के ध्येय के बजाय रट्टा मारकर डिग्री लेने की शिक्षा पद्धति देश को अच्छे और कुशल नागरिक देने की जगह बेरोजगारों की भीड़ दे रही है।

2. सरकारी नौकरियों के प्रति अत्याधिक आकर्षण : आम भारतीय नागरिक के दिलो-दिमाग में सरकारी नौकरी के प्रति इतना आकर्षण है कि वो प्राईवेट कंपनी में नौकरी करने या अपना व्यवसाय शुरू करने के बारे में सोचते ही नहीं है। अपने जीवन काल में बहुमूल्य ऊर्जावान वर्ष सरकारी नौकरी की तैयारी में गंवा देते हैं। ये हमें अच्छे से ज्ञात है कि सिर्फ सरकारी नौकरी के दम पर कोई देश विश्वगुरु नहीं बन सकता।

3. व्यवस्था में अंदर तक फैला भ्रष्टाचार : छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक देश की व्यवस्था में भ्रष्टाचार इस कद्र व्याप्त है कि अब हमें इसकी आदत पड़ गई है। रिश्वत मांगने या देने में अब हमें शर्म या गुस्सा नहीं आता। अगर भारत को विश्वगुरु बनाना है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ कई कानून बनाने होंगे। एक भ्रष्टाचार मुक्त देश ही दूसरों को रास्ता दिखा सकता है।

4. मुफ्त की रेवड़ी बांटने का प्रचलन : वोटों के लालच में नेता, जनता को सब चीजें मुफ्त देकर उन्हें आलसी और नकारा बना रहे हैं। जिस देश के नागरिक काम ही नहीं करना चाहेंगे, वो कैसे दूसरों के लिए मिसाल बनेंगे।

5. समस्याओं पर सिर्फ राजनीति होना : नेता देश की समस्याओं के समाधान पर बात करने के बजाय एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं। कभी-कभी लगता है कि राजनीति ने आम लोगों को भी अलग-अलग पार्टियों में बांट दिया है। अब वो भी समस्याओं को उठाने के बजाय नेताओं को गाली देने में समय गवां देते हैं।

अगर हमें भारत को विश्वगुरु बनाना है तो लोगों को जागरूक और प्रेरित करना होगा। उनमें देश के प्रति गर्व की भावना जागृत करनी होंगी, तभी वो देश को आगे ले जाने के लिए मिलजुल कर जज्बे से काम करेंगे। नेताओं को अपना स्वार्थ छोड़कर देश की समस्याओं के समाधान पर जोर देना होगा। जब सब मिलकर ईमानदारी, देशभक्ति, जोश और जुनून के साथ अपना कर्तव्य निभाएंगे, तभी भारत विश्वगुरु बन पाएगा। 

- पवन कुमार, सातरोड़ - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
आतंकवाद, अंधविश्वास और जाति प्रथा प्रमुख चुनौतियां हैं : पवन कुमार
प्राचीन काल में भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। भारत ने विश्व को शिक्षा, योग, गणित आदि विषयों में विश्व को रास्ता दिखाया है। जिससे विश्व भारत को विश्वगुरु मानता था। लेकिन, समय के साथ ये खिताब भी भारत से छीन गया। इसमें धार्मिक दंगे, अंधविश्वास, पश्चिमी सभ्यता का पालन आदि प्रमुख वजह बनी। इसमें भारत का गुलाम रहना भी प्रमुख कारण है। इसमें भारत की कला और संस्कृति का कमी हुई। लेकिन भारत आज भी विश्वगुरु बन सकता है। इसके लिए हमें कुछ प्रमुख चुनौतियों से निपटना है।
 
जिसमें आतंकवाद, अंधविश्वास और जाति प्रथा प्रमुख चुनौतियां हैं, जो भारत को विश्वगुरु बनने से रोक रही हैं। हमें पश्चिमी संस्कृति का पालन आंख बंद करके नहीं करना चाहिए। इससे हमारी संस्कृति नष्ट हो रही है। हमें विज्ञान के क्षेत्र में भी उन्नति करनी पड़ेगी, ताकि हम विश्व का मार्गदर्शन कर सकें। जैसे हमने चंद्रयान-3 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतार कर दिखाया था। इसका एक उदाहरण योग भी है। इसका लोहा आज पूरा विश्व मान रहा है। हमें अपनी संस्कृति को वापस अपनाना पड़ेगा। विश्व को बताना पड़ेगा कि भारत विश्वगुरु बनने की काबिलियत रखता है।
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मोनिका सुंदर सिंह, गढ़ी, हांसी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हमारे प्राचीन ग्रंथों को भी पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए: मोनिका सुंदर सिंह
पुराने समय में भारत एक विश्वगुरु देश रहा है। हमारी संस्कृति इतनी महान होती थी कि विदेशों से ज्यादा संख्या में विद्यार्थी यहां पढ़ने आते थे। तक्षशिला, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय इस बात के गवाह हैं। हमारे महान ग्रंथ गीता और रामायण को विदेशों में भी फॉलो किया जाता था। हमारी संस्कृति की इतनी ज्यादा महानता रही है। जो बात हमारे वेदों में हजारों वर्षों पूर्व लिखी गई है।
 
आज भी अन्य देशों के वैज्ञानिक उनको साबित नहीं कर पाए हैं। हमारे पूर्वज हनुमान जी बिना हवा में कैसे हवा में उड़ते थे। लेकिन आज भी किसी देश के महान वैज्ञानिक इस तकनीक की खोज नहीं पाए हैं। रामायण में कैसे एक मृत व्यक्ति लक्ष्मण जी को जड़ी-बूटी की मदद से जिंदा किया गया। अब तक हजारों वर्ष बीत जाने पर भी कोई भी देश इतना सक्षम नहीं बन पाया है।
 
आज के युवा को सोशल मीडिया का इतना ज्यादा नशा हो गया है कि इसके बिना वह अपना दिन नहीं गुजारता है। इसके चलते वह हमारी इस विरासत को नहीं संभाल पा रहा है। युवा पीढ़ी अपनी जिम्मेदारियों को भूलती जा रही है। हमारी संस्कृति में इतनी महानता होते हुए भी हम विदेशी रहन-सहन, खान-पान को अपनाते जा रहे हैं। समाज में नशा, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, ढोंग-पाखंड, कूड़ा इतना फैल चुका है कि हमारी नौजवान पीढ़ी का दिमाग एकदम खाली हो गया है। देश के नौजवान बच्चों को देश के लिए सोचने का समय नहीं है। शिक्षा को केवल मात्र एक वस्तु समझा जाने लगा है।

पुराने समय में शिक्षा के विद्यार्थी को शिक्षा के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान भी दिया जाता था। ताकि मनुष्य अपने कर्तव्य को समझें और देशप्रेम की भावना विद्यार्थी के अंदर जागृत हो। गुरु-शिष्य का रिश्ता सबसे पवित्र समझा जाता था। वर्तमान समय का मानव एक दिखावटी जीवन जीने का प्रयास करता है। यह हमारे लिए एक चुनौती बन गया है कि क्या हम भारत को फिर से सोने की चिड़िया कहा जाएगा। महाभारत के समय में देखा गया है कि हमारे पास असंख्य हथियार होते थे। अणु-परमाणु को रोकने तक की शक्ति हमारे पास थी।
 
लेकिन आज हमारे पास अणु-परमाणु बॉम्ब तो है, हम उन्हें चलाना भी जानते हैं, लेकिन उनको रोकने की तकनीक का आजतक इजाद नहीं किया गया है। भारत की नौजवान पीढ़ी के पास इतने महान ग्रंथ हैं जिनमें सब कुछ लिखा गया है। जरूरत है तो सिर्फ उन्हें पढ़ने की और उनपर रिसर्च करने की। ताकि हम फिर से एक महान देश के रूप में विकसित होकर निकलें। अन्य देशों के विद्यार्थी हमारी संस्कृति से प्रभावित होकर पढ़ने आएं न कि हम पश्चिमी सभ्यता को अपनाएं। इसके साथ ही हमारे प्राचीन ग्रंथों को भी पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए, जिससे युवाओं को वास्तव में पता चल सके कि हम क्या हैं और हमारे पूर्वज क्या थे।

प्रतियोगी छात्र हैं तो भेजें प्रविष्टि
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं तो अमर उजाला की लेखन प्रतियोगिता में आप भी हिस्सा ले सकते हैं। इसका उद्देश्य संघ लोक सेवा आयोग, हरियाणा लोक सेवा आयोग और अन्य परीक्षाओं में पूछे जाने वाले साामयिक विषयों के प्रति युवाओं की सोच को सामने लाकर बड़ा मंच देना है। नीचे दिए विषय पर युवा अधिकतम 300 शब्दों में अपना आलेख 14 जनवरी तक पासपोर्ट साइज की तस्वीर, नाम-पते और फोन नंबर के साथ ई-मेल hsr-edithead@hsr.amarujala.com पर भेज सकते हैं। निर्धारित तिथि तक प्राप्त आलेखों का मूल्यांकन विशेषज्ञों से कराया जाएगा। सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि का प्रकाशन भी अमर उजाला में किया जाएगा। ध्यान रखें, आपका लेख मौलिक ही होना चाहिए। विषयः राम मंदिर-सियासी मंच या आस्था का समारोह (अंितम ितथि- 14 जनवरी)

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ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आगे रहने के कारण भारत को विश्वगुरु कहा जाता था। भगवान राम और कृष्ण की भूमि भारत में बाद में बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध आैर जैन धर्म के संस्थापक महावीर का जन्म हुआ। उनके अनुयायी पूरी दुनिया में फैले हुए हैं और ज्ञान का प्रसार कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के आंकड़ों के मुताबिक भारत की आबादी 142.86 करोड़ हो गई है। यह चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राष्ट्र बन गया है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था दुनिया को राह दिखाती है। दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान भारत के पास ही है। वेद, गीता, रामायण आदि धर्मग्रंथों का दुनिया ने अनुकरण किया।
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