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Yuva Najariya: खेती घाटे का सौदा, लेकिन एमएसपी लागू करना आसान नहीं

Thu, 22 Feb 2024 02:12 AM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)

सार

प्रतिभागी विद्यार्थियों के लिए अमर उजाला की ओर से शुरू ‘युवा नजरिया’ कॉलम के तहत कई आलेख प्राप्त हुए। ‘एमएसपी को कानूनी दर्जा देने में अड़चनें’ विषय पर मिले आलेखों का मूल्यांकन डीएन कॉलेज, हिसार के जनसंचार विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर एसएस पंवार ने किया। उन्होंने सिवानी के गांव बड़वा निवासी डॉ. सत्यवान सौरभ के आलेख को बेहतर माना है।
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डॉ. सत्यवान सौरभ, बड़वा, सिवानी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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डॉ. सत्यवान सौरभ के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का उद्देश्य फसल की कीमत में उतार-चढ़ाव के बीच किसानों को नुकसान से बचाना है। इसकी गारंटी आज देश में सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है, लेकिन इसे लागूू करना आसान नहीं है। व्यावाहारिक धरातल पर कई चुनौतियां हैं। भारत सरकार सिर्फ 23 फसलों पर ही एमएसपी की घोषणा करती है।

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उनमें भी गेहूं और धान की फसलों की खरीद ही एमएसपी पर होती है, क्योंकि खाद्य सुरक्षा और भंडारण के लिए सरकार को इन फसलों की व्यापक खरीद करनी पड़ती है। किसानों की निरंतर मांग रही है कि एमएसपी गारंटी कानून बनाया जाए। 

एमएसपी के मायने होंगे कि सरकार ने निर्धारित मूल्य दिलाने का वायदा किया है। लेकिन सरकार यह तय नहीं कर सकती कि वह कितनी मात्रा खरीदना चाहती है। किसानों द्वारा सरकार को जितना अनाज दिया जाता है, खरीदना होगा। बाजार कीमतें एमएसपी से तय होती हैं जो ज्यादातर समय ऊंची ही रहती है।
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एमएसपी-आधारित खरीद प्रणाली की बड़ी समस्या बिचौलियों, कमीशन एजेंटों पर कामकाजी निर्भरता व कृषि उपज विपणन समिति के अधिकारियों की लालफीताशाही है। एक औसत किसान के लिए इन मंडियों तक पहुंच पाना मुश्किल होता है और वह कृषि उपज बेचने के लिए बाजार पर निर्भर रहता है।

वर्तमान प्रणाली विशेष फसलों की बाजार में बहुतायत पैदा करती है। इससे साल-दर-साल गहन खेती होती है, जिससे मिट्टी का क्षरण होता है। किसान अपनी समस्याओं के समाधान के लिए बाजार के अनुरूप ढलने के बजाय राजनीतिक दबाव पर भरोसा करते हैं। यह सब इस क्षेत्र में निजी निवेश को दूर रखता है और इस प्रकार कृषि में पिछड़ेपन में योगदान देता है। यह मिट्टी को खराब करता है क्योंकि मिट्टी की स्थिति चाहे जो भी हो, कुछ फसलों को प्राथमिकता दी जाती है, जिनके ऊपर एमएसपी होता है।

इसके परिणामस्वरूप समूह के जल संसाधनों का दोहन, क्षारीयता, लंबे समय में फसलों के उत्पादन में कमी और पर्यावरण को बहुत नुकसान होता है। अगर एमएसपी लाया जाता है तो सरकार की नजर अतिरिक्त व्यय पर होगी जो सालाना 10 लाख करोड़ होगा, जो हमारे पिछले वर्ष के बुनियादी बजट से भी अधिक है। इसलिए यह व्यावहारिक नहीं है। यह सच है कि खेती घाटे का सौदा बन गयी है, लेकिन खेती क्या किसी भी उत्पाद का मूल्य सरकार तय नहीं कर सकती।

विशेषज्ञ की राय
इस लेख में एमएसपी से जुड़े व्यावहारिक मुद्दों का बखूबी जिक्र किया गया है। इसमें इस्तेमाल की गई भाषा शैली काफी प्रभावशाली है। कम शब्दों में तथ्यों का सही से वर्णन किया गया है।
किसान देश की अर्थव्यवस्था सुधारने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसलिए एमएसपी गारंटी कानून लागू किया जाना चाहिए। ताकि किसानों को खेती का फायदा जरूरी तौर पर मिल सके। किसान पूरे देश का पेट भरता है। खेती के दौरान इस्तेमाल होने वाली खाद, कीटनाशक, बीज आदि का खर्च कई बार किसान की वार्षिक आय से ज्यादा बढ़ जाता है। इस कारण उसे नुकसान झेलना पड़ता है। किसान को न्यूनतन समर्थन मूल्य मिलना चाहिए, ताकि किसान की सालभर की मेहनत का फल उसे मिल सके।  - असिस्टेंट प्रोफेसर एसएस पंवार, जनसंचार विभाग, डीएन कॉलेज, हिसार

यह भी जानें :
एमएसपी फसल की एक गारंटीड कीमत होती है, जो किसानों को मिलती है। इसमें फसल की बुआई के दौरान ही फसलों की न्यूनतम कीमत तय कर दी जाती है। अगर कभी फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार इस एमएसपी पर ही किसानों से फसल खरीदती है। पहली बार 1966-67 में एमएसपी दर लागू की गई थी। सीएसीपी के द्वारा की जाने वाली सिफारिशों के आधार पर ही सरकार हर साल 23 फसलों के लिए एमएसपी का एलान करती है।

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