हरियाणा के बहादुरगढ़ के गांव कानोंदा में एक पशुपालक की एक और घोड़ी की संक्रामक रोग ग्लैंडर्स से मंगलवार को मौत हो गई। इसी पशुपालक की इसी सितंबर माह में दो और घोड़ियों की मौत हो चुकी है। घोड़ी के बीमार होने की सूचना मिलने पर राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र (एनआरसीई) हिसार से वैज्ञानिकों की टीम गांव कानोंदा पहुंची। यह टीम जांच के लिए बीमार घोड़ी के स्वैब के सैंपल लेने और लाइलाज घोड़ी को मौत देने आई थी, लेकिन टीम के पहुंचने से घंटाभर पहले ही घोड़ी की मौत हो गई।
गांव कानोंदा निवासी सुनील की घोड़ी सप्ताह भर से बीमार चल रही थी। सुनील ने अपनी घोड़ी के इलाज के लिए पशु चिकित्सा विभाग को दरखास्त लिख कर दी थी। स्थानीय राजकीय पशु अस्पताल के चिकित्सक पहुंचे। उन्हें ग्लैंडर्स के लक्षण लगे। इस पर पशु चिकित्साधिकारियों ने घोड़ी के स्वैब के सैंपल लेकर जांच के लिए राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र (एनआरसीई) हिसार भेजे। जांच में रिपोर्ट ग्लैंडर्स पॉजिटिव आई।
इस पर मंगलवार को एनआरसीई से डॉ. हरीशंकर सिंघा के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम बीमार घोड़ी के स्वैब के सैंपल लेने के लिए और घोड़ी को मौत की नींद सुलाने के लिए बहादुरगढ़ के गांव कानोंदा पहुंची। लेकिन टीम के अस्तबल पहुंचने से पहले ही घोड़ी की मौत हो चुकी थी।
इससे पहले इसी माह में सुनील की एक घोड़ी की 8 सितंबर और एक घोड़ी की 17 सितंबर को मौत हो चुकी है। पशुपालन अधिकारियों ने बताया कि उन घोड़ियों के गंभीर बीमार होने की पशु मालिक ने कोई सूचना नहीं दी। हिसार से आए अश्व वैज्ञानिकों ने घोड़ी के नाक से स्वैब के सैंपल लिए। आवश्यक कार्रवाई कर मृत घोड़ी को गांव से बाहर खुले स्थान पर जेबीसी से गहरा गड्ढा खुदवाकर दफना दिया गया। घोड़ी की जांच से दफनाने के कार्य तक की सारी कार्रवाई के दौरान सभी वैज्ञानिकों ने अपनी सुरक्षा के लिए पीपी किट पहनी हुई थी। संवाद
तीस किलोमीटर के दायरे में होगी घोड़ों की जांच
उपंमडल पशुपालन एवं पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. रवींद्र सहरावत ने बताया कि गांव कानोंदा के जिस घर में घोड़ी की ग्लैंडर्स संक्रमण से मौत हुई है उसके आसपास के पशुओं को संक्रमण से बचाने के लिए अभियान चलाया जाएगा। पांच किलोमीटर वर्ग क्षेत्र में अश्व प्रजाति के सभी पशुओं के और 30 किलोमीटर वर्ग क्षेत्र में अश्व प्रजाति के 25 प्रतिशत पशुओं के सैंपल लिए जाएंगे। ग्लैंडर्स के संदिग्ध लक्षणों वाले पशुओं को अलग-अलग स्थानों पर रखने के लिए पशु पालकों को निर्देश दिए जाएंगे।
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क्या हैं ग्लैंडर्स के लक्षण
ग्लैंडर्स एक खतरनाक संक्रमण है। इंसान में तो इसका इलाज हो जाता है। लेकिन अश्व प्रजाति के पशु नहीं बच पाते। पशुओं में यह लाइलाज बीमारी है। यह खासतौर पर अश्व प्रजाति के पशुओं में लगता है। यह वायरस जानलेवा होता है। ग्लैंडर्स संक्रमित पशु को बुखार रहता है। फेफड़ों में गांठ हो जाती हैं। सांस की नली में अल्सर बन जाते हैं। ग्लैंडर्स पीड़ित पशु को दूसरे पशुओं से दूर रखना चाहिए और तुरंत सरकारी डॉक्टर को सूचित करना चाहिए।
कानोंदा निवासी ग्रामीण की घोड़ी ग्लैंडर्स पॉजिटिव थी। इसलिए मंगलवार को उसकी मौत हो गई। एनआरसीई और पशुपालन विभाग के डाक्टरों ने मौत के बाद भी जांच के लिए उसके स्वैब के सैंपल लिए हैं। आसपास के क्षेत्र में अश्व प्रजाति के पशुओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सैंपलिंग की जाएगी।
- डॉ.मनीष डबास, उप निदेशक, पशुपालन विभाग झज्जर
7 घोड़ों के सैंपल लेकर केंद्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र में भेजे
लुवास के चिकित्सकों की टीम ने मंगलवार को बहादुरगढ़ में घोड़ों में ग्लैंडर्स की जांच के लिए सैंपल लिए। मंगलवार को टीम के पहुंचने के कुछ मिनट पहले ही तीसरी घोड़ी की मौत हो गई। लुवास पशु वैज्ञानिकों की टीम ने 7 घोड़ों के सैंपल लेकर केंद्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र में भेजे गए हैं। इन सैंपल की दो दिन में रिपोर्ट आएगी।
प्रदेश में इस साल अब तक ग्लैंडर्स के सात केस मिल चुके हैं। डबवाली, रोहतक में ग्लैंडर्स के केस मिल चुके हैं। बहादुरगढ़ में केस मिलने के बाद लुवास की टीम सैंपल लेने पहुंची। ग्लैंडर्स मिले सभी घोड़े-घोड़ियों की मौत हो चुकी है।
मंगलवार को लुवास की टीम बहादुरगढ़ पहुंची थी। तीसरी घोड़ी की मौत हो गई। लुवास की टीम ने 7 घोड़े-घोड़ियों के सैंपल लेकर भेजे हैं। दो दिन में इनकी रिपोर्ट आएगी।
-हरिशंकर सिंघा, वैज्ञानिक, केंद्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र