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Haryana: अब एलाइजा टेस्ट से छह घंटे में हो सकेगी घोड़ों में ग्लैंडर्स की पहचान, टेस्ट किट फार्मूला बनाया

Thu, 08 Sep 2022 02:51 AM IST
भूपेंद्र सिंह उदयभान त्रिपाठी, अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)

सार

राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र ने टेस्ट किट का फार्मूला बनाया है। एक किट से 50 घोड़ों की जांच हो सकती है। किट की रिपोर्ट लैब जैसी ही संतोषजनक है। उत्तराखंड के पांच डॉक्टरों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अन्य डॉक्टरों को भी तरीके बताएंगे।
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एलाइजा किट से ग्लैंडर्स बीमारी की जांच का प्रशिक्षण लेते उतराखंड से आए पशु चिकित्सक। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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हरियाणा के हिसार में राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार ने घोड़ों की लाइलाज बीमारी ग्लैंडर्स की जल्द पहचान के लिए एलाइजा टेस्ट किट विकसित की है। इस किट से महज छह घंटे में ही प्राथमिक स्तर पर बीमारी की पहचान हो सकेगी। साथ ही सभी सैंपल प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजने की जगह केवल प्राथमिक तौर पर लक्षण वाले सैंपल को ही भेजना होगा। इससे प्रयोगशाला में भी दबाव घटेगा। इस किट से टेस्ट के लिए उत्तराखंड के पांच पशु चिकित्सकों को तीन दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ये पशु चिकित्सक अपने अन्य साथियों को प्रशिक्षण देंगे।

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घोड़ों में बैक्टीरिया जनित बीमारी ‘ग्लैंडर्स’ होती है, जिसका अभी तक कोई उपचार नहीं है। घोड़े की सभी प्रजातियों में पाई जाने वाली यह बीमारी इंसान में भी आ सकती है। इसीलिए संक्रमित घोड़े की पहचान होते ही उसे मारकर मिट्टी में दफनाया जाता है, जिससे बीमारी का फैलाव न हो। इस बीमारी की जांच राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार की प्रयोगशाला में होती है।

प्रयोगशाला में सैंपल जांच के बाद रिपोर्ट आने में कम से कम दो दिन का समय लग जाता है। इसको देखते हुए अश्व अनुसंधान केंद्र ने ग्लैंडर्स की जांच के लिए एलाइजा टेस्ट का फार्मूला विकसित किया है। रक्त नमूनों पर आधारित इस जांच किट से महज छह घंटे में ही बीमारी की पहचान हो जाती है। 
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ग्लैंडर्स पर रिसर्च कर रहे केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हरिशंकर सिंघा ने बताया कि एलाइजा किट से जांच में बीमारी की आरंभिक स्तर पर पुष्टि हो जाती है। इसके बाद दोबारा सैंपल लेकर प्रयोगशाला में इसकी पुष्टि कर लेते हैं। एलाइजा टेस्ट की रिपोर्ट प्रयोगशाला जैसी ही विश्वसनीय है। 

जुलाई में डबवाली में किया था प्रयोग
सिरसा जिले में इस साल जुलाई में दो घोड़े ग्लैंडर्स पीड़ित मिले थे। पहले इनका एलाइजा टेस्ट कराया और फिर सैंपल लेकर प्रयोगशाला में जांच की। दोनों नमूनों में एक समान परिणाम आए। पहला टेस्ट पॉजिटिव आते ही, अगल-बगल के अन्य घोड़ों की हिस्ट्री जुटाई और उनके नमूनों को भी जांच के लिए भेजा गया। प्रयोगशाला में दूसरी टेस्ट रिपोर्ट में भी ग्लैंडर्स की पुष्टि होने पर बीमारी की रोकथाम के लिए संक्रमित घोड़ों को मार दिया गया। 

उत्तराखंड में श्रद्धालु व पर्यटकों में संक्रमण का खतरा 
श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बने उत्तराखंड में ऊंचाई पर चढ़ने के लिए अभी भी बड़ी संख्या में घोड़ों का उपयोग होता है। अगर कोई घोड़ा इस बीमारी से संक्रमित है तो उसके संपर्क में आने से अन्य घोड़े भी संक्रमित हो सकते हैं।संक्रमित घोड़ों पर यात्रा करने वाले श्रद्धालु भी संक्रमण की चपेट में आ सकते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड के पांच पशु चिकित्सकों को एलाइजा किट से ग्लैंडर्स जांच का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 

अश्व अनुसंधान केंद्र में डॉ. हरिशंकर की देखरेख में प्रशिक्षण ले रहे ये पशु चिकित्सक यहां से जाने के बाद अपने प्रदेश के अन्य पशु चिकित्सकों को भी इसका प्रशिक्षण देंगे। इसके बाद धार्मिक व पर्यटन स्थलों पर उपयोग में लाए जाने वालों घोड़ों की वृहद स्तर पर जांच होगी।
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डॉ. यशपाल शर्मा

ग्लैंडर्स अभी तक लाइलाज है, इसलिए प्राथमिक स्तर पर जांचकर घोड़ों को मार देना ही एकमात्र सुरक्षित विकल्प है। एलाइजा टेस्ट से तत्काल बीमारी की पहचान हो जाएगी। इस आधार पर संक्रमित घोड़े को अन्य घोड़ों से अलग कर लिया जाएगा। दोबारा प्रयोगशाला टेस्ट में पुष्टि के बाद संक्रमित घोड़े को मार दिया जाएगा। इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए समय से जांच कराना ही सबसे बेहतर व आसान विकल्प है। - डॉ. यशपाल शर्मा, निदेशक, राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार 

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