हिसार। खेती की प्रकृति में तेजी से बदलाव आ रहा है। प्राकृतिक खेती वक्त की जरूरत है। किसान अपने उपयोग के लिए कम क्षेत्रफल में इस विधि से खेती शुरू करे। ये बातें हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्र सदलपुर में प्राकृतिक खेती पर आयोजित किसान मेला के मुख्य अतिथि एचएयू के विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. बलवान सिंह मंडल ने कहीं।
उन्होंने कहा कि खेती में रसायनों के बढ़े प्रयोग का दुष्परिणाम भी सामने आने लगा है। मनुष्यों के साथ-साथ धरती भी बीमार होने लगी है। इससे बचने के लिए प्राकृतिक विधि से खेती जरूरी है। रसायनों के कुप्रभाव से बचेंगे तो खुद के इलाज का खर्च भी घटेगा और हमारी मिट्टी भी फिर से उपजाऊ बनेगी। निदेशक ने कहा कि युवाओं को खेती के क्षेत्र में आने की जरूरत है। वे अपने उत्पाद की ब्रांडिंग करके अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। अब कृषि क्षेत्र में भी खूब नए-नए विचारों को स्वीकार किया जा रहा है।
अध्यक्षता कर रहे केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र कुमार ने कहा कि प्राकृतिक खेती कम खर्च में होती है। उन्होंने जीवामृत, बीजामृत, निमास्त्र आदि की जानकारी दी। डॉ. नरेंद्र ने कहा कि कृषि व पशुपालन एक दूसरे के पूरक हैं। किसान अपने खेत में अधिक से अधिक गोबर की खाद डालें, जिससे कि मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनी रहे। इस दौरान कृषि विभाग, इफको व प्रगतिशील किसानों ने अपनी प्रदर्शनी भी लगाई। इस मेले में 849 किसानों ने हिस्सा लिया। इनमें से 40 प्रगतिशील किसानों को सम्मानित किया गया। इस मौके पर डॉ. ओपी नेहरा, डॉ. बीडी यादव, डॉ. जगदेव, डॉ. वीनू सांगवान, डॉ. अजीत सिंह, डॉ. दिनेश, डॉ. कुलदीप, डॉ. सतबीर, रामेश्वर करीर, सुरजीत, सुरेंद्र ढाका आदि मौजूद रहे।