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Hisar: आजादी के लिए गृहस्थी जीवन त्यागा, महात्मा गांधीजी से मिलने के लिए 50 मील पैदल चले पतराम शर्मा

Thu, 10 Aug 2023 02:05 PM IST
नवीन दलाल रवि घोड़ेला, बालसमंद (हरियाणा)

सार

वर्ष 1939 में धर्मयुद्ध सत्याग्रह में हिसार से 21 सत्याग्रहियों को लेकर हैदराबाद गए थे तब उन्हें जत्था लेकर जाने पर डेढ़ साल की सजा सुनाई गई हालांकि नवाब के जल्दी ही घुटने टेक देने के कारण अन्य सत्याग्रहियों के साथ छह माह के कारावास के बाद जेल से मुक्त होकर हिसार आ गए।
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स्वतंत्रता सेनानी पतराम शर्मा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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वर्ष 1901 में रावलवास खुर्द में जन्मे स्वतंत्रता सेनानी पतराम शर्मा ने भारत को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। स्वतंत्रता सेनानी के भतीजे भूरुराम शर्मा ने अमर उजाला से खास बातचीत में बताया कि ताऊजी ने आजादी के लिए गृहस्थी जीवन का त्याग कर दिया था। स्वतंत्र भारत में वे गांव रावलवास खुर्द के पहले सरपंच बने। वर्ष 1920 में पतराम महात्मा गांधीजी से मिलने के लिए पैदल ही 50 मील का सफर तय कर भिवानी पहुंच गए थे। आजादी के लिए वे चार बार जेल गए। वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन का हिस्सा बने और सरकार के खिलाफ नारे लगाने के जुर्म में इन्हें जेल जाना पड़ा था। उन्हें डेढ़ वर्ष का कठोर कारावास भी झेलना पड़ा।

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वर्ष 1932 में फतेहाबाद के धांगड़ में जलसा करने पर इन्हें गिरफ्तार कर एक साल के लिए जेल भेजा गया था। वर्ष 1939 में धर्मयुद्ध सत्याग्रह में हिसार से 21 सत्याग्रहियों को लेकर हैदराबाद गए थे तब उन्हें जत्था लेकर जाने पर डेढ़ साल की सजा सुनाई गई हालांकि नवाब के जल्दी ही घुटने टेक देने के कारण अन्य सत्याग्रहियों के साथ छह माह के कारावास के बाद जेल से मुक्त होकर हिसार आ गए। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के कारण छह माह की सजा हुई। 

डिप्टी स्पीकर ने दो साल पहले प्रतिमा बनवाने की घोषणा की थी
पतराम शर्मा के भतीजे भूरूराम शर्मा ने बताया कि गांव में दो वर्ष पूर्व डिप्टी स्पीकर रणबीर गंगवा ने स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमा बनवाने की घोषणा की थी। लेकिन अभी तक प्रतिमा बनवाने का कार्य शुरू नहीं किया गया है। परिवार की मांग है कि शर्मा श्मशान भूमि की चहारदीवारी, पार्क और प्रतिमा का अनावरण जल्द करवाया जाए।
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15 साल से परिवार के सम्मान को भूला प्रशासन
भूरूराम ने बताया कि आजादी के लिए अपने प्राणों का त्याग करने वाले पतराम के संघर्ष को मौजूदा सरकार और प्रशासन भूलता नजर आ रहा है। प्रशासन ने पिछले 15 साल से स्वतंत्रता दिवस पर परिवार को कोई सम्मान नहीं दिया है। इससे पूर्व हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर सम्मान में किताबें दी जाती थी, लेकिन अब प्रशासन परिजनों को सम्मान देना भूल गया है।

इंदिरा गांधी की हार के सदमे में हुआ था देहांत
स्वतंत्रता सेनानी पतराम शर्मा ने आजादी की लड़ाई में इंदिरा गांधी के साथ कार्य किया था। भूरूराम ने बताया कि वर्ष 1977 में स्वतंत्रता सेनानी रेडियो पर समाचार सुन रहे थे। इस दौरान उन्होंने इंदिरा गांधी की चुनाव में हार का समाचार सुना और सदमा लगने से उनका देहांत हो गया था।

स्वतंत्रता सेनानी पतराम शर्मा के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। वे आजाद भारत में गांव रावलवास खुर्द के पहले सरपंच चुने गए थे। गांव में प्रतिमा लगवाने के लिए पंचायत प्रयासरत हैं, जल्द उनकी प्रतिमा लगवाई जाएगी। - राजेश कुमारी, सरपंच, रावलवास खुर्द।
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