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Haryana: हिसार के राखीगढ़ी में तीसरे सेशन के तीसरे साल की खोदाई शुरू, अनेक रहस्यों से उठेगा पर्दा

Thu, 22 Feb 2024 09:44 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, नारनौंद (हरियाणा)

सार

राखीगढ़ी में साइट नंबर-3 पर पहली बार, एक नंबर साइट पर दूसरी बार और सात नंबर साइट पर इस बार तीसरी बार खोदाई हो रही है। पहले सेशन में एएसआई के डायरेक्टर डॉ. अमरेंद्र नाथ ने 1998 से 2000 तक खोदाई की थी।
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नारनौंद राखीगढ़ी में खोदाई शुरू करने के उपरांत का निरीक्षण करते भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नारनौंद(हिसार)। राखीगढ़ी में टीलों के नीचे बहुत कुछ दबा हुआ है जो इस देश के प्राचीन इतिहास के बारे में बड़ी खोज कर सकता है। राखीगढ़ी में तीसरे सेशन के तीसरे साल की खोदाई शुरू हो गई है। इससे हड़प्पा कालीन सभ्यता के बारे में अनेक बातों की जानकारी होगी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान नोएडा, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सहयोग से पुरातत्वविदों की ओर से उत्खनन शुरू किया गया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान, नई दिल्ली के 13 छात्र टीला नंबर एक पर खोदाई करेंगे।

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इस बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग दिल्ली और चंडीगढ़ मंडल संयुक्त रूप से खोदाई करेगा। टीला नंबर 1, 3 और 5 पर खोदाई की जाएगी। इसके लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. संजय मंजुल और चंडीगढ़ सर्कल की एसए के ए कबूई की देखरेख में यह खोदाई चलेगी।

इस बार यह खोदाई मई या जून तक चलने का अनुमान है। राखीगढ़ी पांच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता है। हड़प्पा कालीन साइट राखीगढ़ी उस समय का महानगर होता था। पिछली बार की खोदाई में दृष्टवती नदी के होने के प्रमाण मिले थे। इसके साथ-साथ साइट नंबर एक पर कच्ची ईंटों की दीवारें और साइट नंबर तीन पर एक कुआं मिला था। कुएं का व्यास करीब एक मीटर था और उसके चारों तरफ एक-एक फुट की बी नुमा 32 पक्की ईंटें लगाकर गोल आकार का बनाया हुआ था।
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राखीगढ़ी में कब-कब हुई खोदाई
राखीगढ़ी में साइट नंबर-3 पर पहली बार, एक नंबर साइट पर दूसरी बार और सात नंबर साइट पर इस बार तीसरी बार खोदाई हो रही है। पहले सेशन में एएसआई के डायरेक्टर डॉ. अमरेंद्र नाथ ने 1998 से 2000 तक खोदाई की थी। दूसरे सेशन में डेक्कन यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर प्रोफेसर वसंत शिंदे ने 2011 से 2016 तक खोदाई की थी।

फिलहाल तीसरे सेशन के तीसरे साल की खोदाई पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग दिल्ली के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. संजय मंजुल की देखरेख में हो रही है। उनका प्रयास है कि राखीगढ़ी को आइकॉनिक साइट के रूप में विकसित किया जाए और यहां पर देखने के लिए आने वाले लोगों को कुछ अलग से देखने को मिले। पिछले साल की खोदाई में काफी अवशेष मिले थे। पहले हुई दो बार की खोदाई में खुदाई पूरी होने के बाद साइट को मिट्टी से ढक दिया गया था। इस बार की खोदाई फिर वहीं से शुरू होगी जहां पर पिछली साल बंद की गई थी।

राखीगढ़ी में बन रहा आधुनिक म्यूजियम
प्रदेश सरकार की तरफ से 23.85 करोड़ रुपये की लागत से एक आधुनिक म्यूजियम, कैफेटेरिया, हॉस्टल व रेस्ट हाउस का निर्माण किया जा रहा है। इसमें से हॉस्टल, रेस्ट हाउस व कैफेटेरिया का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है। म्यूजियम का काम पूरा होने के बाद खोदाई के दौरान निकला हुआ सामान रखा जाएगा। सब चीजों का जानकारी यहां पर आने वाले पर्यटकों मिल पाएगी। इसके कारण आने वाले समय में राखीगढ़ी इंटरनेशनल पर्यटक हब के रूप में विकसित होगा।

हड़प्पाकालीन सभ्यता के समय में लोगों ने शुरुआत में हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाकर खाना खाने व पकाने में प्रयोग करते थे। उसके बाद चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाने शुरू कर दिए थे। शुरुआती समय में साधारण तरीके से आग पर खाना पकाया जाता था और फिर भट्टी पर खाना बनाना शुरू कर दिया था। पिछली बार की खोदाई में काफी भट्ठियों के अवशेष भी मिले थे।

हड़प्पा कालीन सभ्यता के समय में लोग दूध व दूध से बनी वस्तुओं जैसे कच्ची लस्सी, दही, मक्खन, पनीर इत्यादि वस्तुओं का प्रयोग अधिक करते थे। उसी समय की परंपरा आज भी पूरे भारत में चली आ रही है। समय के अनुसार बर्तन बदल गए क्योंकि उस समय के लोग मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करते थे लेकिन अनेक प्रकार की धातुओं से बने बर्तनों का प्रयोग होता है।

50 हेक्टेयर जमीन से सभ्यता हो चुकी है नष्ट
राखीगढ़ी में 550 हेक्टेयर जमीन पर यह सभ्यता फैली हुई थी। इसमें से लगभग 500 हेक्टेयर से यह सभ्यता नष्ट हो चुकी है। फिलहाल 40 से 50 हेक्टेयर पर ही यह सभ्यता बरकरार है। इसको 7 टीलों में बांटा गया है। साइट नंबर 8 कृषि उपयोग में होने के कारण लगभग नष्ट हो चुकी है और साइट नंबर 9 आधे से ज्यादा नष्ट हो चुकी है।

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