खेलते हुए पहलवान सेइगौचोन हाओपिप
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मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा अगर हममें हो तो कोई भी काम नामुमकिन नहीं होता। हमारी जिंदगी का हर पल इम्तिहानों से भरा होता है। कदम-कदम पर मुश्किलों का सामना होता है और मुश्किलों से भाग जाना तो आसान होता है, साथ ही सामना करने वालों के कदमों में जहां होता है। जातीय हिंसा की दहशत से सहमे राज्य स्तर के पहलवान सेइगौचोन हाओपिप को खेल के प्रति जुनून करीब 2500 किलोमीटर दूर हिसार ले आया। इम्फाल के रहने वाले पहलवान सेइगौचोन हाओपिप ने विपरित परिस्थतियों में भी हार नहीं मानी। इम्फाल में खेल अभ्यास प्रभावित हुआ तो वह हिसार के साई (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) पहुंच गया।
हिसार में मैं सुरक्षित पर माता-पिता की सता रही चिंता
पहलवान सेइगौचोन हाओपिप का कहना है कि मणिपुर में जातीय हिंसा भड़कने से जान को खतरा होने पर उसे मजबूरी में हिसार आना पड़ा। यहां शांत माहौल में प्रैक्टिस बेहतर हो रही है। हालांकि मुझे अपने माता-पिता की चिंता सता रही है। बहन दिल्ली में कजन भाई के पास रह रही है। रोजाना माता-पिता से फोन पर बातचीत कर उनका हालचाल जान रहा है। जब तक मेरी पिता और माता से बातचीत नहीं हो जाती तब तक मेरे दिल को तसल्ली नहीं होती है। वहीं, साई की ओर से पहलवान का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। पहलवान स्टेट लेवल पर खेल चुका है। फिलहाल साई की ओर से आवासीय स्कीम के तहत हॉस्टल में रह रहा है। संवाद
इम्फाल साई में करता था अभ्यास, जान का खतरा होने पर शिफ्टिंग की मांगी थी अनुमति
कुकी समुदाय के पहलवान सेइगौचोन हाओपिप का कहना है कि इससे पहले वह करीब ढाई साल से इम्फाल के साई में प्रशिक्षण ले रहा था। यहां मैतेयी और कुकी समुदाय के करीब 45-50 पहलवान प्रैक्टिस करते हैं, लेकिन मैतेयी समुदाय के ज्यादा खिलाड़ी हैं। इसलिए उसे जान का खतरा था। इसलिए उसने नॉर्थ ईस्ट रीजनल डायरेक्टर इम्फाल को पत्र लिखकर दूसरी जगह शिफ्ट करने की अनुमति मांगी थी। फिर इम्फाल की ओर से नॉर्थ रीजनल सेंटर सोनीपत में पत्र लिखा गया। इसके बाद उसे हिसार के साई में भेजा गया है।
मेरे लिए दूसरी जगह जाना ही बेहतर विकल्प
पहलवान का कहना है कि मुझे वहां जान को काफी खतरा था। मेरे से लोग दुश्मनी चाहते थे। इसलिए दूसरी जगह शिफ्ट होना ही बेहतर था। हालांकि यहां की अभी पूरी तरह भाषा नहीं समझ पा रहा हूं। मगर मैं यहां खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा हूं। कोच भी मुझे सहयोग कर रहे हैं। 30 अगस्त को हिसार पहुंचा था।
आधी-अधूरी हिंदी समझ पा रहा खिलाड़ी
पहलवान इंग्लिश आसानी से समझ लेता है और बोलता भी है। मगर हिंदी भाषा अभी 50 प्रतिशत ही समझ पा रहा है। उसका कहना है कि धीरे-धीरे यहां रूटीन बन जाएगा। इसके बाद भाषा बोलने और समझने में कोई दिक्कत नहीं होगी। हालांकि अभी कई बातें मैं समझ नहीं पाता हूं। बार-बार कोच से पूछना पड़ता है।
सेइगौचोन हाओपिपी साई के हॉस्टल में रह रहा है। यहां उसे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं है। पहलवान का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। -
धर्मेंद्र यादव, वार्डन, इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स