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Agriculture: कंप्यूटर इंजीनियर ने नौकरी छोड़ खेती को बनाया रोजगार, आसपास के किसानों के लिए बन गए रोल मॉडल

Thu, 10 Nov 2022 11:45 PM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)

सार

प्रभुवाला के मनीष सच्चर ने डीएसआर विधि से धान की उपज बढ़ाई और गांठ बनवाकर पराली का प्रबंधन किया। इस बार 35 एकड़ में धान की बिजाई की थी।
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कंप्यूटर इंजीनियर मनीष सच्चर ने नौकरी छोड़ खेती को बनाया रोजगार। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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युवा पीढ़ी अब खेती में भी नए प्रयोग करने लगी है। इसके सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगे हैं। हरियाणा के हिसार जिले के प्रभुवाला गांव के नौजवान मनीष सच्चर (29) ने पुणे में कंप्यूटर इंजीनियर की नौकरी छोड़ी और गांव आकर खेती में जुट गए। दो साल में ही अपने नए प्रयोग की बदौलत न केवल नौकरी से अधिक आय प्राप्त की, बल्कि बिजाई से लेकर पराली प्रबंधन तक में किसानों के  रोल मॉडल भी बन गए। इस नौजवान किसान ने डीएसआर (डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस) विधि से धान की बिजाई कर न सिर्फ खर्च घटाए, बल्कि पराली की गांठ बनवाकर प्रदूषण नियंत्रण में भी अहम योगदान दिया है।

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उकलाना क्षेत्र के गांव प्रभुवाला निवासी मनीष सच्चर ने दिल्ली से कंप्यूटर इंजीनियर की पढ़ाई पूरी करने के बाद महाराष्ट्र के पुणे शहर में बड़े पैकेज पर नौकरी पा ली थी। कुछ साल नौकरी करने के बाद लगा कि खेती में भी नई तकनीकियों का प्रयोग कर अच्छे परिणाम लाए जा सकते हैं। प्रयोगधर्मी मनीष नौकरी छोड़कर गांव आए और कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेने के बाद खेती में जुट गए।

मनीष बताते हैं कि हरियाणा व पंजाब के सफल किसानों के अलावा विशेषज्ञों से भी बातचीत के दौरान उन्हें धान बिजाई की नई विधि डीएसआर के बारे में पता लगा। पुराने अनुभवी किसानों से इस पर चर्चा के बाद अपने खेत में इसका प्रयोग करने का निर्णय लिया। गेहूं की कटाई के बाद सीड ड्रिल मशीन से धान की सीधी बिजाई करा दी।
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लागत में कमी आई तो मुनाफा भी बढ़ा 
रोपाई की जगह सीधी बिजाई से पानी की बचत होने के साथ ही मजदूर भी कम लगे। एक सप्ताह में ही 35 एकड़ खेत में धान की बिजाई का काम आसानी से हो गया। समय-समय पर खर पतवार प्रबंधन व सिंचाई की तो औसतन प्रति एकड़ 30 क्विंटल धान की उपज हुई। इस विधि से बुवाई करने पर एक चौथाई लागत में कमी आई। अब गेहूं के अलावा खरबूज व तरबूज की खेती करेंगे।

पराली का बनवाया बंडल 
कटर मशीन से पराली कटवा दी। इस पर करीब 500 रुपये प्रति एकड़ का ही खर्च आया। इसके बाद बेलर मशीन से पराली की गांठ बनवाकर निकलवा दी। कृषि विभाग की तरफ से प्रति एकड़ एक हजार रुपये भी इस काम के लिए मिल गए। इस पर पराली निकालने का खर्च तो सरकारी विभाग से ही मिल गया। बिना अतिरिक्त धन खर्च किए ही खेत भी खाली हो गया और प्रदूषण भी नहीं हुआ। गांव के अन्य किसानों ने भी इस विधि को अपनाया है। 

अफसर भी कर रहे सराहना
किसानों के रोल मॉडल बन रहे इंजीनियर मनीष सच्चर की अफसर भी सराहना कर रहे हैं। कृषि विभाग के सहायक अभियंता गोपीराम सिहाग ने कहा कि हमारी युवा पीढ़ी भी खेती में रुचि लेकर इसे लाभकारी बना रही है, यह भविष्य के लिए अच्छे संकेत हैं। मनीष जैसे नौजवान अन्य युवाओं के भी प्रेरणास्रोत हैं। फील्ड अफसर योगेश ने बताया कि मनीष की कोशिश को इलाके के लोग भी सराह रहे हैं। इस नौजवान ने पराली का उचित निस्तारण दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित किया है। इसका असर है कि पराली जलाने की घटनाओं में कमी आ रही है।

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