हिसार। सिसाय के चंदगीराम अखाड़े के पहलवानों ने देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पदक जीतकर विश्व पटल पर पताका फहराया है। 38 साल पहले शुरू हुए अखाड़े में आज 120 पहलवान दाव-पेंच सीख रहे हैं। इनमें राष्ट्रीय स्तर के 50 और अंतरराष्ट्रीय स्तर के 10 पहलवान शामिल हैं। इस अखाड़े से प्रशिक्षण लेकर पहलवान दीपक पूनिया और विकास ने जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया। इसी प्रकार विशाल कालीरावण में सीनियर नेशनल में रजत पदक जीता। जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में सोनू ने रजत और नीलम ने कांस्य पदक पर कब्जा किया।
वर्तमान में इस अखाड़ा में 120 पहलवान देश के लिए पसीना बहा रहे हैं। इस अखाड़ा को स्वर्गीय पहलवान चंदगीराम ने शुरू किया था। उन्होंने ओलंपिक तक का सफर पूरा किया। उन्हें पदमश्री अवार्ड से सम्मानित भी किया गया था। मगर 2010 में बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। उसके बाद से इस अखाड़ा को पहलवान सुभाष
चला रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले अखाड़ा में मिट्टी में कुश्ती के दाव-पेंच सिखाए जाते थे। लेकिन 2007 से मैट पर कुश्ती चल रही है। खेल के दम पर अब तक 80 से ज्यादा पहलवान सरकारी नौकरी हासिल कर चुके हैं। छह पहलवान विकास, विशाल, अमन, दीपक, विकास और विजय रेलवे में टीटी के पद पर कार्यरत है। खास बात है कि 2022 में सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में इस अखाड़ा के पांच खिलाड़ियों ने पदक हासिल किए थे, जोकि एक साथ पांच पदक जीतना बड़ी उपलब्धि रही है। इनमें प्रीता कुमार, विकास ने रजत और अमन, पूजा सिहाग और विशाल ने कांस्य पदक हासिल किया था।वहीं, पिता के साथ बेटा विष्णु भी खिलाड़ियों को कुश्ती के दाव-पेंच सीखा रहा है।
अखाड़ा की खासियत
इस अखाड़ा में एक बड़ा हाॅल है। पहलवानों के रहने की बेहतरीन सुविधा दी गई है। तीन से चार ग्रुप में खिलाड़ियों को अभ्यास कराया जाता है।पहलवानों के अनुशासन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। खासियत है कि यहां के पहलवानों के पद्रर्शन को देख आज इस अखाड़ा में मथुरा, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात सहित अन्य स्टेट के पहलवान यहां रहकर दाव-पेंच सीख रहे हैं।पदक के दम पर आज खिलाड़ी विभिन्न सरकारी विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
इस तरह होता है टूर्नामेंट के लिए चयन
पहलवान सुभाष ने बताया कि जिला स्तर पर तो कोई भी पहलवान ट्रायल दे सकता है। लेकिन जब भी राज्य स्तरीय प्रतियोगिता होती है तो उसे जिला स्तर की चैंपियन टीम जाती है। इसी प्रकार राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए स्टेट की विजेता टीम खेलने जाएगी। जब भी अखाड़ा के पहलवान किसी टूर्नामेंट में जाते हैं तो वह पदक लेकर आते हैं।
तीन साल पहले मैंने कुश्ती से अपने कॅरिअर की शुरूआत की थी। नेशनल चैंपियनशिप में रजत और कांस्य पदक जीत चुका हूं। मेरा सपना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत नाम रोशन करना है। अखाड़ा में बेहतरीन सुविधा मिल है।कुश्ती की नई-नई तकनीक सीखाई जाती है।आज अन्य राज्यों के खिलाड़ी भी यहां अभ्यास कर रहे हैं।
- गौरव, पहलवान
आज के समय में कुश्ती ही बेहतरीन खेल हैं। इसमें खिलाड़ी की खुद की मेहनत रंग लाती है।मैं चार साल से कुश्ती के दाव-पेंच सीख रहा हूं।नेशनल चैंपियनशिप में दो पदक जीत चुका हूं। अखाड़ा के खिलाड़ियों को खेलते देख मैंने भी कुश्ती सीखने की ठानी थी। परिवार के सदस्यों का सहयोग मिला तो मुझे अखाड़ा में भेज दिया।
- दक्ष, पहलवान
मैंने नेशनल चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता था। अब इसे स्वर्ण में बदलने का सपना पूरा करूंगा। पांच साल पहले कुश्ती सीखना शुरू की। मेरा और परिवार के सदस्यों का सपना है कि मैं कुश्ती में पदक जीतकर देश और गांव का नाम रोशन करूं। अखाड़ा में खिलाड़ियों की प्रैक्टिस पर फोकस रखा जाता है।
- सागर, पहलवान
नेशनल चैंपियनशिप में दो पदक जीत चुका हूं। गांव के बच्चों को खेलते देखा तो मैंने भी कुश्ती में कॅरिअर बनाने की ठानी और छह साल पहले अभ्यास शुरू कर दिया। अब मेरा सपना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतना है।आज अखाड़ा के पहलवान विदेशों में भी पदक जीत नाम रोशन कर रहे हैं।
हितेश, पहलवान
38 साल से अखाड़ा चल रहा है।अखाड़ा के पहलवानों ने न केवल पदक जीते हैं, बल्कि खेल कोटे के तहत सरकारी नौकरी भी हासिल की हैं। दूसरे राज्यों के पहलवान भी यहां प्रशिक्षण ले रहे हैं। अब तक अखाड़ा में 2000 से ज्यादा पहलवान प्रशिक्षण ले चुके हैं।
- पहलवान सुभाष, संचालक एवं कोच, चंदगीराम अखाड़ा, सिसाय