फतेहाबाद। टिकट वितरण के बाद बने राजनीतिक समीकरणों के बीच जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर दलों में भीतरघात की आशंका भी बढ़ गई है। इससे न सत्ताधारी भाजपा बच पाएगी और न ही मुख्य मुकाबले में चल रही कांग्रेस। भीतरघात की आशंका को इसलिए अधिक बल मिल रहा है क्योंकि कांग्रेस और भाजपा से टिकट मांग रहे बड़े नेता अभी तक खुलकर सार्वजनिक मंचों पर पार्टी प्रत्याशी के लिए मैदान में नहीं आए हैं। इस कारण उनसे जुड़े कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। दूसरी तरफ, पाला बदलने का दौर भी तेज हो चुका है। फतेहाबाद शहर के 13 पार्षदों के बाद अब नगर परिषद के चेयरमैन राजेंद्र खिची भी भाजपा से राहें जुदा करके कांग्रेस के पाले में चले गए हैं। इसी तरह भूना नगरपालिका चेयरपर्सन अपर्णा पसरीजा भी दीपेंद्र हुड्डा के समक्ष कांग्रेस को समर्थन दे आई हैं।
फतेहाबाद सीट पर यह है स्थिति
जिला मुख्यालय की फतेहाबाद विधानसभा सीट पर तो कांग्रेस और भाजपा दोनों खेमों में ही भीतरघात की आशंका है। कांग्रेस से 19 दावेदार टिकट मांग रहे थे। इनमें से बलवान सिंह को टिकट मिलने के बाद पूर्व सीपीएस प्रहलाद सिंह गिल्लाखेड़ा, पूर्व विधायक कुलबीर बैनीवाल, वरिष्ठ नेता डॉ. वीरेंद्र सिवाच, राष्ट्रीय सचिव डाॅ. विनीत पूनिया जैसे प्रमुख चेहरे अभी तक खुलकर सार्वजनिक रूप से मैदान में प्रचार के लिए नहीं आए हैं। भाजपा प्रत्याशी दुड़ाराम ने अपने जनसंपर्क अभियान के दौरान प्रहलाद गिल्लाखेड़ा की तारीफ करके भीतरघात जैसे सियासी संकेत भी दिए हैं। इसी तरह भाजपा से टिकट मांग रहे प्रमुख दावेदारों में शामिल वेद फुलां रतिया और प्रवीन जोड़ा टोहाना में ज्यादा समय बिता रहे हैं।
टोहाना में पोते बबली के मंच पर नहीं आए दादा बराला
टोहाना विधानसभा क्षेत्र में भी भाजपा प्रत्याशी देवेंद्र सिंह बबली के साथ अभी तक कद्दावर नेता पूर्व प्रदेशाध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद सुभाष बराला ने सार्वजनिक मंच साझा नहीं किया है। ग्रामीण रिश्ते के अनुसार सुभाष बराला देवेंद्र बबली के दादा लगते हैं। हालांकि, भाजपा की टिकट मिलने के दो दिन बाद देवेंद्र बबली नामांकन से पहले सुभाष बराला के घर जाकर उनसे मिलकर भी आए थे। बबली का नामांकन करवाने खुद मुख्यमंत्री नायब सैनी भी पहुंचे, लेकिन सुभाष बराला उस दिन टोहाना में ही होने के बावजूद नहीं आए। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बराला और बबली की यह दूरियां भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं को एकता के सूत्र में बांधने में बाधा बन रही है। जब तक खुलकर बराला बबली के साथ नहीं आएंगे, तब तक भाजपा की राहें मुश्किल रहेंगी।
रतिया में तो कार्यकर्ता व नेता साथ ही छोड़ गए
रतिया विधानसभा क्षेत्र में तो भाजपा की टिकट घोषित होते ही कार्यकर्ताओं से लेकर नेताओं तक में बवाल मच गया। सुनीता दुग्गल को भाजपा प्रत्याशी बनाते ही खुद विधायक लक्ष्मण नापा ही पार्टी का साथ छोड़कर कांग्रेस में चले गए हैं। बाजीगर समाज में बड़ा प्रभाव रखने वाले मुख्तयार बाजीगर भी भाजपा छोड़कर आम आदमी पार्टी में चले गए हैं। दो दिन पहले ही पंचायत समिति के चेयरमैन केवल मेहता भी भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। खुद टिकट मांग रहे भाजपा जिलाध्यक्ष बलदेव ग्रोहा के अलावा कोई बड़ा नेता सुनीता दुग्गल के साथ जुड़ा नजर नहीं आ रहा है।
जिले में कांग्रेस और भाजपा में ही मुख्य मुकाबला माना जा रहा है। मगर इन दोनों ही पार्टियों में भीतरघात की सबसे अधिक आशंका नजर आ रही है। फतेहाबाद और टोहाना सीट पर तो सार्वजनिक तौर पर नेताओं की नाराजगी दिख रही है।
-देवेंद्र सिंह, राजनीतिक विशेषज्ञ।