फतेहाबाद के गांव शेखुपुर में चुनाव पर चर्चा करते ग्रामीण।
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फतेहाबाद। गांव शेखुपुर दड़ौली में एक सरपंच ऐसे भी रहे हैं, जिनका कार्यकाल मात्र दो माह का ही रहा। पहले सरपंच से खफा पंचों ने उनको कार्यकाल पूरा होने से दो माह पहले ही सरपंच पद से हटा दिया। गांव के माड़ूराम को सरपंच पद की गद्दी दे दी। माड़ूराम दो माह तक सरपंच रहे, लेकिन इसके बाद कभी गांव के सरपंच नहीं बन पाए।
फतेहाबाद हलके के गांव शेखुपुर दड़ौली का एक किस्सा ग्रामीणों में काफी प्रचलित है। 1955-56 में जब पंचायती राज के चुनाव हुए तो गांव के खेताराम को पंचों ने अपना सरपंच चुन लिया। यह उस समय की बात है, जब सरपंच चुनने का अधिकार पंचों के पास था। पंच के पास यह भी पावर थी कि सरपंच के कामकाज सेे नाखुश होकर वह सरपंच को पद से हटा भी सकते थे। उस समय सरपंचों का कार्यकाल भी तीन साल तक का ही होता था।
कार्यकाल पूरा होने से दो माह पहले छूट गई थी सरपंची की गद्दी
खेताराम के कार्यकाल को पूरा होने में जब दो माह का समय बचा था। उस समय पंचों ने उनके खिलाफ बगावत कर दी और उन पर काम न करने के आरोप लगाते हुए कार्यकाल समाप्त होने के दो माह पहले ही उनको सरपंच पद से हटा दिया। इसके बाद सभी ने मिलकर गांव के माड़ूराम को सरपंच पद पर आसीन किया। माड़ूराम का गांव में सबसे छोटा सरपंच पद का कार्यकाल रहा है और वह भी मात्र दो माह का। बड़ी बात यह है कि इसके बाद माड़ूराम कभी भी गांव के सरपंच नहीं बन पाए। संवाद
कोट
गांव में दो प्रत्याशी भी रहे हैं, जिन्होंने तीन-तीन बार गांव के मुखिया पद की कमान संभाली है। इनमें सूरजाराम व गणपत भदरेचा तीन-तीन बार गांव के सरपंच बने। अब तक गांव में नौ सरपंच बन चुके हैं। गांव में 1955-56 में हुआ पंचायत का चुनाव आज भी याद है। उस समय सरपंच को दो महीने पहले ही हटाकर माड़ूराम को सरपंच पद पर बैठा दिया गया था। पहले सरपंच खेताराम ने अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाए थे।
-अमीलाल, ग्रामीण
गांव में चुनाव भाईचारे की तरह लड़ा जाता है। शेखुपुर दड़ौली गांव में 800 परिवार हैं और 3200 के करीब वोट हैं। सभी ग्रामीण आपस में मिल जुलकर रहते हैं।
-सुशील, ग्रामीण
करीब दो साल बाद गांव में हो रहे पंचायती चुनाव में भाईचारे का विशेष ध्यान रखा जाएगा। गांव में हर बिरादरी के लोग रहते हैं और इस बार गांव की महिला ओपन सीट है। गांव वाले सोच विचार करके ही अपना प्रत्याशी चुनेंगे।
-गुलाब सिंह, ग्रामीण