चरखी दादरी। जिले से वर्ष 1990 व 1992 में अयोध्या गए कारसेवकों ने शुक्रवार को अपने उस समय के अनुभव साझा करते हुए कहा कि वे पल तो ऐतिहासिक हैं और हमारे लिए आजीवन अविस्मरणीय रहेंगे। कारसेवक सुरेश, विरेंद्र, जगदीश लाल जुनेजा और वरुण सिंह ने बताया कि आंदोलन के समय वहां स्थानीय लोगों ने कारसेवकों की खूब सेवा की। वे स्वयं गरीब तबके से थे, फिर भी कारसेवकों के लिए भोजन की व्यवस्था जरूर करते थे। यहां तक पानी के साथ चने, पताशे और मखाने आदि भी देते थे। वे धन से जरूर गरीब थे, लेकिन दिल के बड़े अमीर थे।
उन्होंने कहा कि राम मंदिर केवल आस्था का ही नहीं हिंदुत्व का स्वाभिमान भी है। उन्होंने बताया कि बताया कि उस समय कुछ लोग आस्था के वशीभूत होकर अयोध्या पहुंचे थे और कुछ लोग स्वाभिमान बचाने के लिए आंदोलन कर रहे थे।
सरयू के किनारे भूखे रहकर बिताए थे तीन दिन
1990 में अयोध्या के लिए रवाना हुआ था। सरयू नदी के किनारे पर जब पहुंचे तो पुलिस ने वहां रोक लिया और उससे आगे नहीं बढ़ पाए। भूखे रहकर वहीं तीन दिन बिताए और रातें पराली व कंबल में काटी। बाद में वहां से वापस आ गए। अब 9 फरवरी को राम दर्शन करूंगा।
-सुरेश कुमार, कारसेवक
ग्रामीणों का भरपूर मिला सहयोग
चारों आंदोलनों में शामिल हुआ था। जब भी गया ग्रामीणों ने भरपूर सेवा की। पानी के साथ भी खाने की चीजें देते थे। साल 1990 में रास्ते में जाते समय दूसरे संप्रदाय के लोगों ने डंडों से गाड़ी पर धावा बोला था और इसमें गाड़ी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। बाद में धीरे-धीरे दादरी तक पहुंचे। हमारे उस संघर्ष का फल अब मिलने जा रहा है।
-विरेंद्र सिंह, कारसेवक
पुलिस ने किया गिरफ्तार, नहीं पहुंच पाए अयोध्या
वर्ष 1992 में अयोध्या गया था। उस समय जब पहुंचा तो पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और मंदिर तक नहीं पहुंच पाए। दो दिन जेल में बंद रहा। अब मुझे बहुत खुशी है कि मैं उस समय भगवान के लिए इस कार्य में शामिल रहा। अब भगवान की मर्जी से ही जा पाऊंगा।
-जगदीश जुनेजा, कारसेवक
स्वाभिमान के लिए पहुंचा था अयोध्या
अयोध्या भगवान में आस्था के साथ ही हिंदुत्व के स्वाभिमान के लिए गया था। अगर वह मकबरा नहीं हटता तो हिंदू समाज को दासता की वह निशानी हमेशा सताती। उसके टूटने से ही आज देश का स्वाभिमान ऊंचा उठा है। मुझे खुशी है कि उस समाज की उस विषमता को मैंने अपने हाथों से तोड़ा। अब 9 फरवरी को राम मंदिर में जाऊंगा।
-वरुण मित्तल, कारसेवक