चरखी दादरी। शहर में शुद्ध पेयजल अब सुविधा नहीं, बल्कि मजबूरी बनता जा रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि नलों से आने वाला पानी पीने लायक नहीं है। मटमैला रंग, बदबू और कई बार पीलेपन के कारण लोगों का जलापूर्ति से भरोसा टूटता जा रहा है। नतीजतन, शहर के अधिकांश वार्डों, कॉलोनियों और घनी आबादी वाले इलाकों में लोग बोतलबंद पानी और आरओ कैंपर के सहारे अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं। इस स्थिति ने जहां सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं निजी आरओ और पानी सप्लायरों का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है।
शहरवासियों का कहना है कि नल से आने वाला पानी न केवल पीने के लिए अनुपयुक्त है, बल्कि लंबे समय तक घरेलू उपयोग में भी परेशानी पैदा कर रहा है। कपड़े धोने से लेकर खाना बनाने तक में दिक्कतें आ रही हैं। पहले लोग नल का पानी उबालकर पी लिया करते थे, लेकिन अब उबालने के बाद भी पानी की गंध नहीं जाती। ऐसे में बच्चों और बुजुर्गों की सेहत को लेकर डर बना रहता है। मजबूरी में लोगों को आरओ लगवाने या रोजाना कैंपर मंगवाने पड़ रहे हैं।
प्रतिदिन डेढ़ लाख लीटर पानी की निजी सप्लाई
शहर में प्रतिदिन करीब डेढ़ लाख लीटर पानी निजी आरओ और कैंपरों के माध्यम से सप्लाई किया जा रहा है। इससे लगभग 30 हजार की आबादी अपनी दैनिक जरूरत पूरी कर रही है। सर्दियों के मौसम में प्रतिदिन करीब 7 हजार कैंपर, जबकि गर्मियों में यह संख्या बढ़कर 10 हजार तक पहुंच जाती है। इस तरह हर महीने लाखों रुपये केवल पीने के पानी पर खर्च हो रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, शहर में हर महीने साढ़े तीन लाख रुपये से अधिक का पानी आरओ के जरिए पीया जा रहा है।
25 आरओ से बुझ रही शहर की प्यास
शहर में इस समय करीब 25 निजी आरओ पानी सप्लायर सक्रिय हैं। ये सप्लायर कॉलोनियों, दुकानों, कार्यालयों और घरों में नियमित रूप से पानी की सप्लाई कर रहे हैं। एक कैंपर की कीमत क्षेत्र और दूरी के हिसाब से 500 रुपये तक वसूली जा रही है। महीने भर में यह खर्च कई परिवारों के लिए भारी पड़ रहा है, लेकिन दूषित पानी पीने के डर से लोग यह खर्च उठाने को मजबूर हैं।
पहले हम नल का पानी उबालकर पी लेते थे, लेकिन अब हालात इतने खराब हो चुके हैं कि उबालने के बाद भी पानी की गंध नहीं जाती। बच्चों और बुजुर्गों की सेहत को लेकर डर बना रहता है। इसलिए घर पर आरओ लगवाना पड़ा। वहीं दुकान में दो कैंपर रखवाने पड़ रहे हैं। महीने में करीब 500 से हजार रुपये सिर्फ पानी पर खर्च हो जाते हैं, लेकिन इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है।- संदीप फोगाट, प्रधान, मोबाइल एसोसिशन
रोजाना पीने व खाना बनाने के लिए साफ पानी चाहिए। नल से आने वाला पानी इतना गंदा है कि कपड़े धोने में भी दिक्कत होती है। हम आरओ कैंपर नियमित रखवा रहे हैं। खर्च जरूर बढ़ गया है, लेकिन बीमार पड़ने से बेहतर है कि साफ पानी लिया जाए। सरकार को इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।- मीनू, कबीर नगर
साल में दो बार लिए जाते हैं सैंपल
पेयजल की गुणवत्ता को लेकर जनस्वास्थ्य विभाग की भूमिका अहम है। विभागीय जानकारी के अनुसार साल में आरओ से दो बार पानी की गुणवत्ता के सैंपल लिए जाते हैं। आज तक इस प्रकार का का मामला सामने नहीं आया है, जिसमें आरओ का सैंपल फेल हुआ हो। आरओ से आने वाले पानी में टीडीएस 100 के नीचे मिलता है, जो सेहत के लिए ठीक है। यही कारण है कि लोग अब आरओ के पानी के भरोसे प्यास बुझा रहे हैं।
वर्जन :
जमीन से पानी निकालकर, उसे शुद्ध करके ही पानी को शहर में सप्लाई किया जाता है। विभाग की ओर से हर साल सैंपल लिए जाते है, जिसमें पानी की गुणवत्ता खरी उतरती है। जिले में करीब 25 आरओ संचालित हो रहे हैं, शहर में तेजी से आरओ कैंपर की मांग बढ़ी है।
- राजेश फाेगाट, सदस्य, आरओ संचालक यूनियन दादरी।