गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण करते कमांडेंट श्योकरण सिंह।
चरखी दादरी। गांव अचीना निवासी और आजादी हिंद फौज में रहे कैप्टन श्योकरण सिंह ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्हें दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों ताम्रपत्र भी सम्मान के रूप में मिला। श्योकरण सिंह ने एक साल मुल्तान जेल में बिताया।
श्योकरण सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते अंग्रेजी हुकूमत ने उनको फांसी की सजा सुनाई लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी कोर्ट में पैरवी की, जिसकी बदौलत वे रिहा हो गए। श्योकरण सिंह के बड़े बेटे नंबरदार उमेद सिंह ने बताया कि उनके पिता का जन्म 1916 में हुआ था। उन्होंने 1934 में दसवीं कक्षा पास की। बाद में 21 अक्तूबर 1943 को वे आजाद हिंदी फौज में भर्ती हुए। सुभाषचंद्र बोस के आह्वान पर सिंगापुर की चढ़ाई की और अंडमान निकोबार पर तिरंगा फहराया।
स्वतंत्रता सेनानी श्योकरण सिंह अर्काना फ्रंट के कमांडर भी बने। अंग्रेजों की सरकार ने उन पर मुकदमा चलाया और फांसी की सजा सुना दी लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू की कानूनी पैरवी की बदौलत वे रिहा हो गए। बाद में श्योकरण सिंह फौज से घर आ गये। फौज से आने के बाद उन्होंने प्रजामंडल के गठन से जुड़ी गतिविधियों में भाग लिया। पूर्व सीएम बनारसीदास गुप्ता के साथ काम किया।
- इंदिरा गांधी के अलावा सूबे के दो सीएम से मिला सम्मान
श्योकरण सिंह को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों ताम्रपत्र मिला। पूर्व सीएम बंसीलाल व पूर्व सीएम देवीलाल ने भी उनको सम्मानित किया था। श्योकरण सिंह ने द्वितीय विश्व युद्ध और मैं शीर्षक से आत्मकथा भी लिखी। उनके तीन बेटे व चार बेटियां हैं।