चरखी दादरी। मैं शहर के चरखी दरवाजा के नजदीक मथुरी घाटी क्षेत्र का जोहड़ हूं। मेरा निर्माण करीब दो सौ साल पहले हुआ था और उस दौरान हजारों मवेशियों को यहां पानी उपलब्ध करवाता था। इतना ही नहीं मेरे बगल में एक कुआं था जिसका मीठा पानी आसपास के क्षेत्र के लोगों की प्यास बुझाता था। जरूरत थी तब तक लोगों और प्रशासन ने मेरा और कुएं का ख्याल रखा, लेकिन जब विकल्प मिल गया तो हमारी उपेक्षा शुरू हो गई। लंबे समय से ऐसा हो रहा है और मुझमें भरे पानी की ऊपरी सतह पर जो प्लास्टिक की पॉलिथीन नजर आ रही हैं वो उपेक्षा की बानगी है। आज जो मेरी दुर्दशा है, इसका कारण आमजन, प्रशासन, नेताओं और सरकार की मेहरबानी है।
मथुरी घाटी क्षेत्र के लोगों ने बताया कि अधिकारियों ने जोहड़ की दशा सुधारने की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया। प्रशासनिक अनदेखी के चलते जोहड़ के आसपास अतिक्रमण बढ़ता रहा और इसका दायरा छोटा हो गया। पिछले दस साल के अंदर जोहड़ का न केवल आकार कम हुआ बल्कि बदहाली बढ़ती गई। अनदेखी का ही नतीजा है कि वर्तमान में ये जोहड़ दूषित पानी से लबालब है। ऊपरी स्तह पर प्लास्टिक की थैलियां व कचरे की भरमार है।
लोग बोले : पहले बारिश के पानी से लबालब रहता था जोहड़
यह जोहड़ बारिश के दिनों में पानी से लबालब रहता था। बुजुर्ग ने जो हमें बताया उसके अनुसार जोहड़ करीब 200 साल पुराना है। इसके किनारे मीठे पानी का कुआं वर्षभर लोगों की प्यास बुझाता था और बारिश के दिनों में कहीं भी जलभराव नहीं होता था। आधे शहर का पानी इसमें समा जाता था।
-रामनिवास सोनी, 70 वर्ष
- शहर की आबादी लगातार बढ़ती गई और जोहड़ का दायरा घटता गया। इसके कारण अब बारिश के समय में यह ओवरफ्लो हो जाता है और पानी आसपास के घरों में घुस जाता है। करीब 50 साल पहले बारिश का पानी सीधे इसमें चला जाता था और बाद में वर्षभर इससे पशुओं व जीव-जंतुओं की प्यास बुझती थी।
सतबीर सिंह चौहान, 65 वर्ष
-जोहड़ की अनदेखी के चलते अब यह दूषित पानी से लबालब है और लोगों के लिए परेशानी का सबब बना है। इसके किनारे मीठे पानी का कुआं वर्षभर लोगों की प्यास बुझाता था। कभी यह क्षेत्र इसके कारण हरा-भरा था और बारिश के दिनों में कहीं भी जलभराव नहीं होता था। अब ऐसा नहीं है।
कृष्णलाल, 70 वर्ष
50 साल पहले शहर में जलभराव की समस्या नहीं थी। बारिश के दौरान शहर के काफी क्षेत्रों का पानी जोहड़ में आ जाता था। समय के साथ जोहड़ बदहाल होता गया और आकार घटने से इसकी पानी वहन करने की क्षमता भी कम होती गई। अब आलम ये है कि पूरे जोहड़ में कचरे की भरमार है।
-नौरंगलाल, वर्ष