चरखी दादरी। जब ज्ञान रूपी प्रकाश जीवन में आता है तो जीवन में अलग ही निखार आता है। साथ ही सफलता के लिए कदम भी बढ़ने लगते हैं। ऐसा ही काकड़ोली हट्ठी निवासी उषा श्योराण ने करके दिखाया है। पैर से दिव्यांग होने के कारण लाचार महसूस करना छोड़कर कोच के कहने पर खेलना शुरू किया। अब तक वह राष्ट्रीय स्तर पर तीन पदक जीत चुकी हैं।
उषा श्योराण जन्म के छह माह बाद ही पोलियाे का शिकार हो गई थीं। इसमें उनका बायां पैर कमजोर हो गया। इसके बाद से वह अपने घुटने पर हाथ रखकर चलने लगीं। बाद में उन्होंने शिक्षा ग्रहण की। वर्ष 2013 में उनकी शादी हो गई। फिलहाल, दो बेटियां हैं।
उनका लक्ष्य बड़ी होकर कहीं सरकारी नौकरी करना था। शादी के बाद समय नहीं मिला और मन भी पढ़ाई से हट गया। अब दो साल से पैरा कोच विक्की कुमार उन्हें खेलने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। गत वर्ष अक्तूबर में उन्होंने कुछ करने की ठानी और अपने पति और परिजनों के कहने पर उषा ने अक्तूबर 2024 में खेलने की शुरुआत की।
पहली बार लॉन बॉल के लिए अक्तूबर माह में ही ट्रायल दिया। बहादुरगढ़ में राज्यस्तरीय स्पर्धा में उषा ने एक स्वर्ण और एक रजत पदक हासिल किया। इसके बाद उनका मनोबल बढ़ा और उन्होंने विक्की के कहने पर वॉलीबाल का अभ्यास शुरू कर दिया।
21 से 23 मार्च तक तमिलनाडु में राष्ट्रीय पैरा वॉलीबाल स्पर्धा आयोजित की गई। इसमें उषा ने हरियाणा की टीम का प्रतिनिधित्व किया। स्वर्ण जीतकर उन्होंने क्षेत्र का नाम रोशन किया।
पहले पोलियो फिर सात साल तक रहीं बीमार
उषा ने बताया कि बचपन में पोलियो हो गया। इसकी मार अभी तक दिक्कत कर रही है। शादी के बाद सात साल तक बीमार रहीं। इस दौरान शारीरिक कमजोरी और पोलियो के कारण उबरने में समय लगा। अब दो बच्चे हैं। लोगों के ताने सुनकर जीवन में नई शुरूआत की है।
प्रतिदिन चार घंटे करती हैं अभ्यास
उषा ने बताया कि वह वॉलीबाल का प्रतिदिन चार घंटे अभ्यास करती हैं। इसके लिए वह दादरी शहर में आती हैं। दो घंटे सुबह व दो घंटे शाम को अभ्यास कर अपनी प्रतिभा निखार रही हैं। पहली बार में उषा ने राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतना उनका लक्ष्य है।
घर पहुंचने पर हुआ स्वागत
उषा के पदक जीतकर घर पहुंचने पर पिता साहब सिंह दहिया, मांगेराम फोगाट, ओमप्रकाश, ओमवीर दहिया, मनोज शर्मा, सुरेंद्र दहिया समेत अन्य मौजिज लोगों ने माला पहनाकर स्वागत किया। साथ ही शहर में विजय जुलूस निकालकर खिलाड़ी का मनोबल बढ़ाया गया।