चरखी दादरी। शहर में रामलीला की शुरुआत भारत-पाकिस्तान बंटवारे से पहले हुई थी। अगले साल रामलीला मंचन को 100वां साल लग जाएगा। करीब पांच से छह दशक पहले रामलीला के किरदार निभाने वाले कलाकारों की मानें तो उस दौर में गांवों से लोग ऊंट रेहड़ों में रामलीला देखने आते थे। आलम ये होता था कि मैदान में पांव रखने की भी जगह नहीं होती थी। समय के साथ रामलीला मंचन में भी काफी बदलाव आया है और दर्शकों की संख्या भी कम हुई है।
पुराने कलाकारों की मानें तो दादरी शहर में रामलीला की शुरुआत वर्ष 1925 में हुई थी। भारत-पाक और भारत-चीन युद्ध के समय ही रामलीला मंचन नहीं हुआ। इसके अलावा कोरोनाकाल में भी रामलीला का मंचन नहीं हुआ था। संवाददाता ने रविवार को वर्ष 1955 और 1963 में रामलीला मंचन के दौरान अलग-अलग किरदार निभाने वाले कलाकारों से बातचीत को तो उन्होंने कुछ ऐसे पहलू उजागर किए जिनसे हर कोई आज के समय वाकिफ नहीं है। बताया जा रहा है कि शहर में रामलीला की शुरुआत मूलचंद नागवान ने की थी। संवाद
- 15 साल की उम्र में निभाने लगा था रामलीला के किरदार
वर्ष 1955 में रामलीला मंचन के दौरान भरत का किरदार निभाया था और उस समय उम्र 15 साल थी। बाद में भरत के साथ परशुराम का किरदार भी निभाया। पहले पुरुषों के अलावा महिलाएं और बच्चे भी काफी तादाद में रामलीला देखने आते थे, लेकिन समय के साथ दर्शकों की संख्या कम हो गई।
-गजानंद, पूर्व कलाकार
पहले रामलीला थी मनोरंजन का सबसे बेहतर जरिया
- उस समय टीवी और मोबाइल नहीं होते थे। रामलीला मंचन को मनोरंजन का सबसे अच्छा जरिया माना जाता था। लोग रामलीला देखने के लिए उत्सुक रहते थे और ऊंट रेहड़ों पर सवार होकर दूर-दराज के क्षेत्रों से शहर पहुंचते थे। रामलीला मंचन लगातार जारी है, इस बात की बेहद खुशी है।
-घीसूराम, कलाकार
- शहरवासी आज भी मुझे बुलाते हैं लक्ष्मण नाम से
रामलीला में पहली बार महज 11 वर्ष की आयु में बाल अंगद का रोल किया था। इसके बाद 2016 तक अनेक किरदार निभाए। सबसे अधिक बार लक्ष्मण का रोल किया है। लंबे समय तक ये किरदार निभाने के बाद आज 56 साल की उम्र में लोग मुझे लक्ष्मण के नाम से पुकारते हैं।
-ज्योति स्वरूप, कलाकार
- 1965 में निभाया था भगवान राम का किरादार
रामलीला में वर्ष 1965 के दौरान भगवान राम का रोल अदा किया था। आज मेरी उम्र 81 वर्ष है, लेकिन अभी भी राम का हर डायलॉग कंठस्थ है। पहले रामलीला देखने के लिए लोग दूर-दराज के गांवों से आते थे और महिलाएं व बच्चे आगे बैठने के लिए शुभारंभ से दो घंटे पहले ही आना शुरू हो जाते थे।
अर्जुनलाल, कलाकार