चरखी दादरी। दादरी उपभोक्ता न्यायालय ने बीमा दावों के निपटान को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि वारिस होने के अन्य पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं तो बीमा कंपनियां केवल उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की मांग कर कानूनी दावों को तकनीकी आधार पर खारिज नहीं कर सकती। दादरी उपभोक्ता न्यायालय के न्यायाधीश मनजीत सिंह नरयाल ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह निर्णय दिया है। इसके साथ ही उन्होंने बीमा कंपनी को 15 लाख रुपये का 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने के निर्देश भी दिए।
बता दें कि दादरी जिले के कस्बा बौंद कलां निवासी डॉ. मनोज सोनी का जनवरी 2023 में एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। उनकी कार नेशनल इंश्योरेंस कंपनी से बीमित थी। जिसमें 15 लाख रुपये का व्यक्तिगत दुर्घटना कवर भी शामिल था। मृतक के परिजनों ने जब क्लेम के लिए आवेदन किया तो बीमा कंपनी ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र और अदालती चालान जैसे दस्तावेजों की कमी का हवाला देते हुए 5 जून 2024 को दावा खारिज कर दिया। इसके बाद परिजनों ने उपभोक्ता न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उपभोक्ता न्यायालय में अधिवक्ता रोबिना बूरा ने शिकायतकर्ता की तरफ से पैरवी की।
आयोग ने की यह टिप्पणी
उपभोक्ता न्यायालय दादरी के न्यायाधीश मनजीत सिंह नरयाल ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि शिकायतकर्ताओं ने पहले ही मृत्यु प्रमाण पत्र और कानूनी अभिभावक नियुक्त करने संबंधी अदालती आदेश जैसे दस्तावेज पेश कर दिए थे। न्यायालय ने बीमा कंपनी की कार्यप्रणाली को सेवा में कोताही और अनुचित व्यापार व्यवहार माना। न्यायालय ने कहा कि वास्तविक क्लेम पर कानूनी वारिसों का हक होता है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या करते हुए न्यायालय ने मृतक की माता और दो नाबालिग बच्चों को प्रथम श्रेणी का वारिस माना। न्यायालय ने आदेश जारी करते हुए बीमा कंपनी को नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 15 लाख रुपये का भुगतान करने के निर्देश दिए। साथ ही निर्देश दिए कि यह राशि मृतक की माता, पुत्र व पुत्री में बराबर हिस्सों में बांटी जाएगी। साथ ही कहा कि बच्चों के हिस्से की राशि उनके 18 वर्ष की आयु ग्रहण करने तक बैंक में फिक्सड डिपॉजिट के रूप में रहेगी, जिसका ब्याज उनके भरण-पोषण के लिए दादी को मिलेगा। साथ ही न्यायालय ने मुकदमा खर्च के तौर पर 10 हजार रुपये भी देने के आदेश दिए। न्यायालय ने वाहन की टूट-फूट के लिए पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण उस हिस्से को खारिज कर दिया।