चरखी दादरी। अगर औलाद मुकाम हासिल कर अपनी पहचान बना ले तो पिता के लिए इससे बड़ी खुशी नहीं हो सकती। वहीं, अगर मुकाम हासिल करने का क्षेत्र पिता वाला ही हो तो खुशी दोगुनी हो जाती है। जिले के कई ऐसे लाल हैं जिन्होंने अपने पिता के नक्शे कदम पर चलकर उन्हीं के क्षेत्र में नाम कमाया है। पदक जीतने के मामले में परिवार की दूसरी पीढ़ी पहली पीढ़ी को पीछे छोड़ चुकी हैं। बेटा और बेटी की इस उपलब्धि पर पिता को गर्व की अनुभूति हुई है। पिता के बाद खेल क्षेत्र में छाप छोड़ने वाली संतानों पर पेश है एक रिपोर्ट...
युवा खिलाड़ियों की उपलब्धियां
पिता से प्रशिक्षण पाकर अंतरराष्ट्रीय पहलवान बने सुजीत कलकल
इमलोटा निवासी दयानंद कलकल अपने जमाने के राष्ट्रीय पहलवान रह चुके हैं। उन्हीं की प्रेरणा से उनके पुत्र सुजीत कलकल कुश्ती में अंतरराष्ट्रीय पटल पर नाम कमा चुके हैं। सुजीत के पिता दयानंद वर्ष 2013 से 2019 तक सेना में कुश्ती कोच रहे। वह सेना से वर्ष 2019 में सेवानिवृत्त हुए। अब वह साई सेंटर सोनीपत में कुश्ती कोच हैं। सेंटर के अलावा पिछले करीब आठ साल से वह बेटे सुजीत को भी प्रशिक्षण दे रहे हैं।
- पिता ने राष्ट्रीय स्तर पर तो बेटे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीते पदक
किष्कंधा निवासी पैरा एथलीट देवेंद्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 18 पदक जीत चुके हैं। एक सड़क हादसे में मिले दिव्यांगता के घाव पर उन्होंने पिता धर्मेंद्र सिंह की प्रेरणा से पदक जीत कर मरहम लगाया। सेना से सेवानिवृत्त धर्मेंद्र राष्ट्रीय वॉलीबाल खिलाड़ी रह चुके हैं। दिव्यांग बेटे को खेलों से जोड़ने में उनकी अहम भूमिका है। उनकी इस मेहनत के अब सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं।
- पिता से मिली शुरुआती दीक्षा, पदक जीत रहे अतुल और शिक्षा
रानीला निवासी अतुल और दीक्षा साहू भाई-बहन हैं। ये चक्का फेंक स्पर्धा के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं। दोनों भाई-बहन 25 पदक जीते चुके हैं। चार साल के खेल कॅरिअर में अतुल ने पांच राष्ट्रीय, छह प्रांतीय और एक अंतरराष्ट्रीय पदक जीता है। वहीं, शिक्षा साहू राष्ट्रीय स्तर पर 12 पदक जीत चुकी हैं। उनके पिता नफे सिंह राष्ट्रीय सतर के पहलवान रह चुके हैं। उन्हीं की प्रेरणा से अतुल और शिक्षा खेल के क्षेत्र में आए।
- पिता ऋषि की तरह बेटा ऋषभ भी लगातार जीत रहे पदक
रानीला निवासी ऋषभ साहू चक्का फेंक स्पर्धा में अपनी पहचान बन चुके हैं। राष्ट्रीयस्तर की कई स्पर्धाओं में राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुके 19 वर्षीय ऋषभ 18 पदक जीत चुके हैं। ऋषभ के पिता ऋषि साहू भी चक्का फेंक स्पर्धा में राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे हैं। बेटे को इस क्षेत्र में लाने का उनका सपना था। इसे साकार करते हुए ऋषभ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर पिता का सपना साकार करने के लिए मेहनत कर रहे हैं।