फाइल नोट उसी लैपटॉप पर टाइप हुआ था, फिंगरप्रिंट और ईमेल की जांच आवश्यक
संदीप खत्री/संवाद
चंडीगढ़। एडीजीपी आत्महत्या मामले की जांच कई अहम सबूतों के अभाव और प्रक्रिया में रुकावट के चलते आगे नहीं बढ़ पा रही है। सूत्रों के अनुसार परिजनों ने उस लैपटॉप को पुलिस को देने से इन्कार कर दिया है जिसमें फाइल नोट टाइप किया गया था। इस कारण पुलिस की तफ्तीश फिलहाल अटक गई है। सूत्र बताते हैं कि जांच आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले आधिकारिक तौर पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट की आवश्यकता है ताकि स्पष्ट हो सके कि मामला वास्तव में आत्महत्या से संबंधित है या नहीं। अभी तक यह भी पता नहीं चल पाया है कि मरने से पहले एडीजीपी वाई पूरण कुमार ने किस-किस को ईमेल भेजे और किस परिस्थिति में। लैपटॉप मिलने के बाद पुलिस के लिए फिंगरप्रिंट लेना बेहद जरूरी होगा ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि फाइल नोट किसने टाइप किया।
जेल में बंद गनमैन से पूछताछ कर सकती है एसआईटी
सूत्रों के अनुसार एसआईटी जल्द ही अदालत से अनुमति लेकर रोहतक जेल में बंद गनमैन सुशील से पूछताछ कर सकती है। इंस्पेक्शन में पता चला है कि शराब ठेकेदार की ओर से लगाए गए अवैध वसूली के आरोप के बाद गिरफ्तार गनमैन ही स्पष्ट कर सकता है कि उसने एडीजीपी का नाम खुद लिया था या किसी षड्यंत्र के तहत उससे ऐसा करवाया गया। गनमैन के बयान एसआईटी की जांच के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
कॉल डिटेल में खुलासा, आत्महत्या से पहले कई अफसरों से की बात
एडीजीपी आत्महत्या मामले में पुलिस को कॉल डिटेल से नए सुराग मिले हैं। सूत्रों के अनुसार आत्महत्या से पहले एडीजीपी ने कई अधिकारियों, अपने वकील और कुछ परिचितों को कॉल की थी। एसआईटी ने इन कॉल डिटेल्स को जांच का हिस्सा बनाते हुए बातचीत के क्रम और समय की बारीकी से पड़ताल शुरू कर दी है। सूत्रों का कहना है कि जिन लोगों से एडीजीपी ने आखिरी बार बातचीत की थी। जल्द उनसे पूछताछ की जा सकती है। जांच टीम यह पता लगाने की कोशिश में है कि क्या इन वार्तालाप में कोई ऐसा दबाव या तनाव झलक रहा था जिसने उन्हें यह कदम उठाने पर मजबूर किया।
रिपोर्ट पुलिस जांच के लिए सबसे अहम कड़ी
सूत्रों के अनुसार पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बिना जांच आगे नहीं बढ़ सकती। रिपोर्ट के बाद ही एसआईटी तकनीकी और फॉरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर अगला कदम तय करेगी। कानूनी प्रावधानों के अनुसार यदि किसी मामले में मृतक के परिजन पोस्टमार्टम करवाने की सहमति नहीं देते तो परिस्थितियों को देखते हुए पुलिस कानून के तहत स्वयं पोस्टमार्टम की प्रक्रिया करवा सकती है ताकि सबूतों को सुरक्षित रखा जा सके और जांच बाधित न हो।
बैलिस्टिक विशेषज्ञ और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में होगा पोस्टमार्टम
परिवार की मांग पर यह तय किया गया कि पोस्टमार्टम पीजीआई के डॉक्टरों की टीम द्वारा किया जाएगा। साथ ही मेडिकल बोर्ड में एक बैलिस्टिक विशेषज्ञ और एक मजिस्ट्रेट को शामिल करने की मांग को भी स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद पुलिस ने पोस्टमार्टम प्रक्रिया शुरू की। पीजीआई में मेडिकल बोर्ड का गठन हो चुका है। बैलिस्टिक विशेषज्ञ गोली लगने के मामलों में सबसे अहम यह जांच करता है कि जिस पिस्टल से गोली चली क्या खोखा और गोली उसी पिस्टल की हैं या नहीं। हालांकि शव को छह दिन बीत चुके हैं जिससे डीकंपोज शुरू हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे जांच के दौरान कई अहम सबूत प्रभावित हो सकते हैं। जैसे गोली चलने के बाद शरीर और कपड़ों पर बचा बारूद (गन पाउडर) का अवशेष, जो बेहद नाजुक होता है और समय बीतने के साथ नष्ट हो सकता है।