-दोनों ही समान प्रकृति के अभिभावक, नहीं हो सकता अपहरणकर्ता
-12 वर्षीय लड़के के चाचा ने मां के खिलाफ दाखिल की थी याचिका
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा, माता-पिता को अपने ही बच्चे के अपहरण के अपराध में नहीं फंसाया जा सकता, क्योंकि दोनों ही समान प्राकृतिक अभिभावक हैं। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा कि किसी घटना को अपहरण मानने के लिए यह आवश्यक है कि नाबालिग बच्चे को कानूनी अभिभावक की संरक्षण से दूर ले जाया जाए। मां भी इसके दायरे में आती है, खासकर तब जब सक्षम न्यायालय की ओर से उसे इस अधिकार से वंचित करने का आदेश न दिया गया हो। वर्तमान मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका 12 वर्षीय लड़के के चाचा द्वारा दायर की गई थी। आरोप लगाया गया था कि बच्चे की मां उसके पिता के घर से अपने साथ ले गई थी। मां ने दलील दी कि बच्चे ने खुद ही उसे फोन किया था, क्योंकि पिता ने उसे घरेलू सहायिका के पास छोड़ दिया था। इसलिए मां बच्चे को लेने के लिए ऑस्ट्रेलिया से गुरुग्राम आई थी। बच्च के माता-पिता पहले से ही बच्चे की संरक्षण के लिए मुकदमा कर रहे थे, जिसका निर्णय फ़ैमिली कोर्ट में लंबित है। हाईकोर्ट ने कहा कि असंतुष्ट माता-पिता के बीच अपने बच्चों की संरक्षण को निपटाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण की प्रकृति में रिट याचिका दायर करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। काेर्ट ने कहा कि 5 वर्ष की आयु तक के बच्चे की संरक्षण आमतौर पर मां के पास रहती है। कम उम्र के बच्चों को इस प्रेम और स्नेह से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया और हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।