-कोर्ट ने माना यह संविधान में दिए गए जीवन के अधिकार से सीधे तौर पर जुड़ा
-दावे पर साठ दिन के भीतर विचार कर अगले 30 दिन में भुगतान करने का आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारियों के चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति को केवल मामूली देरी के आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार से सीधे जुड़ा है जिसका तकनीकी आधार पर बलिदान नहीं किया जा सकता।
वरिष्ठ नागरिक ने याचिका दाखिल करते हुए जींद के खंड शिक्षा अधिकारी और जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी द्वारा देरी के आधार पर उसका चिकित्सकीय खर्च प्रतिपूर्ति बिल खारिज करने को चुनौती दी थी। याची ने बताया कि वह सेवानिवृत्त हो चुका है और 19 से 24 सितंबर 2011 के बीच न्यूरो सर्जरी के लिए भर्ती रहा। स्वास्थ्य स्थिति के कारण देरी बिल जमा करवाने में देरी हुई और इसे 7 मई 2013 को पेश किया गया। 1 लाख 52 हजार 364 रुपए का दावा देरी के आधार पर खारिज करते हुए यह कह दिया गया कि उपचार बाहरी रोगी के रूप में किया गया था। कोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी को चिकित्सा दावा प्रस्तुत करने में किसी भी देरी को माफ करने का अधिकार है। पीठ ने आगे कहा कि निर्देशों के मात्र अवलोकन से पता चलता है कि 12 महीने बाद प्रस्तुत किए गए दावों पर भी स्वास्थ्य विभाग प्रशासनिक विभाग के सचिव के स्तर पर विचार कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार के 2003 के निर्देशों के अनुसार, विलंबित दावों पर भी विचार किया जा सकता है। कोर्ट ने 60 दिन के भीतर दावों पर विचार कर 30 दिन के भीतर 18 प्रतिशत ब्याज के साथ भुगतान करने का आदेश दिया है।