-हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया
-छह माह के भीतर जांच करने के प्रावधान को हटाने की याचिका में मांग
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम-2015 को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।
याचिका दाखिल करते हुए कुरुक्षेत्र निवासी उदित ने हाईकोर्ट को बताया कि अधिनियम के अनुसार किशोर न्याय बोर्ड को किसी भी जांच या पूछताछ को शुरू होने की तारीख से छह महीने के भीतर पूरा करना होता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह समय-सीमा पूरी तरह से मनमानी है और यह न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
याचिका में कहा गया कि उसके पिता सुरेंद्र कुमार की 19 मार्च, 2021 को एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की थी। चूंकि इस दुर्घटना में शामिल कुछ आरोपी नाबालिग थे इसलिए मामला कुरुक्षेत्र में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने चला गया। हालांकि, 04 मार्च, 2022 को बोर्ड ने निर्धारित समय-सीमा के कारण कार्यवाही को समाप्त कर दिया। याचिका में इस फैसले को न्याय का उपहास बताया गया है क्योंकि इससे पीड़िता को बिना किसी न्यायिक निष्कर्ष के छोड़ दिया गया।
याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान भारतीय संविधान के कानून के समक्ष समानता और जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि त्वरित सुनवाई का अधिकार एक सराहनीय अधिकार है, जिसे एक कठोर समय-सीमा से सीमित नहीं किया जा सकता। खासकर जब यह न्याय को बाधित करता हो। उन्होंने यह भी तर्क दिया है कि यह धारा अपराधियों को दंडित होने से बचा सकती है जिससे सामाजिक न्याय प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हाईकोर्ट के जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी पर आधारित बेंच ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दायर करने का आदेश दिया है।