हरियाणा कांग्रेस ने राज्यपाल असीम घोष से मुलाकात कर उन्हें राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन साैंपा। ज्ञापन में आगामी जनगणना में जातियों की सही गिनती सुनिश्चित करने के लिए जातियों के नामों की वैज्ञानिक तरीके से मानकीकरण और कोडिंग की मांग की गई है।
ज्ञापन में कहा गया है कि केवल व्यक्ति से उसकी जाति पूछकर दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा। एक ही जाति के अलग-अलग क्षेत्रीय नाम, उपनाम, वर्तनी और उच्चारण के आधार पर अलग-अलग प्रविष्टियां बन गईं तो वास्तविक संख्या कई हिस्सों में बंट सकती है। इससे खासकर ओबीसी, अति पिछड़े, कारीगर और पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े समुदायों के आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।
हरियाणा कांग्रेस ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष चंद्र प्रकाश जांगड़ा के मुताबिक ज्ञापन में ओबीसी के लिए स्पष्ट और अलग श्रेणी रखने तथा प्रत्येक मान्य जाति या समुदाय को एक विशिष्ट वैज्ञानिक कोड देने का सुझाव दिया गया है। इसके तहत किसी जाति के मान्य पर्यायवाची, क्षेत्रीय नाम और वर्तनी के अलग रूपों को विशेषज्ञ सत्यापन के बाद एक ही कोड से जोड़ा जा सके। साथ ही, व्यक्ति द्वारा दर्ज किया गया मूल जाति नाम भी सुरक्षित रखने की मांग की गई है, ताकि उसकी स्व-पहचान बनी रहे।
इसके लिए केंद्र और राज्यों की आधिकारिक सूचियों के आधार पर राज्यवार मानक जाति सूची तैयार करने का सुझाव दिया गया है। किसी समान या वैकल्पिक नाम को बिना जांच दूसरी जाति में मिलाने के बजाय सरकारी रिकॉर्ड, ऐतिहासिक व मानवशास्त्रीय साक्ष्यों और विशेषज्ञों की राय से सत्यापन करने की बात कही गई है।
डिजिटल जनगणना में खोज आधारित ड्रॉप-डाउन व्यवस्था रखने की भी मांग है, जिसमें सामान्य वर्तनी, पर्याय और क्षेत्रीय नाम पहचानकर संबंधित मानक कोड से जोड़े जा सकें। सूची में नाम नहीं मिलने पर उसे दर्ज करने और बाद में विशेषज्ञ सत्यापन की व्यवस्था का भी सुझाव दिया गया है।
ज्ञापन में समाजशास्त्रियों, मानवशास्त्रियों, जनसांख्यिकी विशेषज्ञों, सांख्यिकीविदों, जनगणना व डाटा प्रबंधन विशेषज्ञों तथा सामाजिक न्याय से जुड़े विशेषज्ञों की बहु-विषयक समिति बनाने की मांग की गई है। जाति संगठनों और सामाजिक संगठनों से राज्यवार परामर्श लेने तथा तेलंगाना की सामाजिक-आर्थिक, शैक्षणिक, रोजगार और राजनीतिक सर्वेक्षण की प्रक्रिया का अध्ययन करने का भी सुझाव दिया गया है।
ज्ञापन में तर्क दिया गया है कि सही जातिगत आंकड़े शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्थिति, सरकारी योजनाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असमानताओं को समझने के साथ ओबीसी उप-वर्गीकरण और लक्षित नीतियां बनाने में उपयोगी हो सकते हैं।