पंचकूला नगर निगम के लेखा लिपिक शशि ने 9 जनवरी 2026 को खाते की वास्तविक रकम और बैंक स्टेटमेंट में अंतर पकड़ा और इसकी जानकारी वरिष्ठ लेखा अधिकारी सुरेंद्र जैन को दी। जैन ने इसे उच्च अधिकारियों तक पहुंचाने के बजाय ऐसी नोटशीट तैयार की, जिसमें बैंक की खराब सेवा को खाता बंद करने का कारण बताया गया।
वहीं, सेक्शन ऑफिसर अनिल कुमार ने जब प्रतिस्पर्धी कोटेशन मांगने का सुझाव दिया तो तत्कालीन निगम आयुक्त आरके सिंह ने उसे चैंबर में बुलाकर डांटा- और कहा कि भाई तू बहुत ज्यादा समझदार है क्या, तूने क्यो लिखी यह लाइन, जब मैं बता रहा हूं एफडी रेट ज्यादा है। बाद में अनिल कुमार को पद से हटा दिया गया।
आईएएस पंकज अग्रवाल जब शिक्षा विभाग में तैनात थे तो उन्होंने वित्त विभाग की तरफ से तय 50 करोड़ रुपये की सीमा के बावजूद आईडीएफसी फर्स्ट बैंक खाते में 100 करोड़ रुपये जमा करने की कोशिश की। कार्यकारी अभियंता भूपिंदर सिंह ने 31 वित्त विभाग की मंजूरी जरूरी होने की बात कही थी। तत्कालीन मुख्य वित्तीय सलाहकार किरण लेखा वालिया ने भी सचिव पंकज अग्रवाल को बताया था कि बैंक में जमा की सीमा 50 करोड़ रुपये है। इन आपत्तियों के बावजूद 100 करोड़ रुपये जमा कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। पंकज अग्रवाल ने आपत्ति जताने वाले अधिकारी से कहा कि वे ज्यादा कानून न सिखाएं। इसके बाद पिछली तारीख की नई नोटशीट तैयार कर मंजूरी की प्रक्रिया पूरी की गई।
पंकज अग्रवाल जब हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड (एचएसएएमबी) में तैनात थे तो चीफ अकाउंट्स ऑफिसर राजेश सांगवान तत्कालीन अध्यक्ष से बार-बार शिकायत की कि उन पर बैंक अधिकारी के पक्ष में दबाव डाला जा रहा है। जब बोर्ड के खाते से दस करोड़ की धोखाधड़ी सामने आई तो अध्यक्ष ने एफआईआर प्रस्ताव दिया। इस पर पंकज अग्रवाल ने रिभव ऋषि रसूखदार व्यक्ति हैं और 10-20 करोड़ रुपये उनके लिए कोई बड़ी रकम नहीं है। एजेंसी ने कहा कि अग्रवाल ने उन्हें भरोसा दिलाया कि पैसा वापस मिल जाएगा और उन्हें कोई शिकायत या एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया।
हरियाणा पावर जनरेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड का बैंक खाता आईडीएफसी बैंक में खोला गया, जबकि यह बैंक सूचीबद्ध नहीं था। तत्कालीन एमडी मोहम्मद शाइन ने बैंक के शाखा प्रबंधक रिभव ऋषि को वित्त निदेशक अमित दीवान और मुख्य लेखा अधिकारी बहादुर सिंह गोसाईं से मिलवाया था। एफडी तोड़कर रकम नए खाते में जमा की गई। बैंक ने 14 फीसदी ब्याज का आफर दिया। चूंकि मंजूरी सबसे वरिष्ठ पद से आई थी, इसलिए नीचे के किसी अधिकारी के लिए सवाल उठाना व्यावहारिक रूप से असंभव था। निगरानी-तंत्र की सबसे ऊपरी कड़ी ही साजिश का हिस्सा थी। सीबीआई का कहना है कि इतनी ज़्यादा ब्याज दर पर शक होना चाहिए था।