-करनाल की अदालत ने सुनाई थी 4 साल की सजा, कोर्ट ने काटी गई सजा को माना काफी
-एक माह के भीतर 25 हजार रुपये जुर्माना अदा करने की शर्त पर होगा रिहा
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। एनडीपीएस के मामले में चार साल की सजा को चुनौती देने वाली याचिका का निपटारा करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 50 साल के व्यक्ति द्वारा काटी गई सजा को काफी मानते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने माना कि याची ने 16 साल अदालत के चक्कर काटे हैं जो अपने आप में सजा के समान है।
जस्टिस सुमित गोयल ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेज अधिनियम के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए करनाल की एक अदालत द्वारा बलविंदर सिंह को सुनाई गई चार साल की कठोर कारावास की सजा को संशोधित किया है। उसे एक महीने के भीतर 25,000 का जुर्माना अदा करने पर रिहा करने की अनुमति दी है।
मामला 2009 का है जब याची को बिना वैध परमिट के 500 ग्राम अफीम रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। नवंबर 2011 में विशेष अदालत ने उसे चार साल के कठोर कारावास और 25,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। साथ ही जुर्माना अदा न करने पर एक साल की अतिरिक्त सजा भी सुनाई थी। याची ने शुरू में दोषसिद्धि और सजा दोनों को चुनौती दी थी। बाद मेंं उनके वकील राहुल वत्स ने पीठ को सूचित किया कि अपील अब केवल सजा कम करने की मांग तक सीमित है जिसमें बलविंदर सिंह की उम्र, बेदाग रिकॉर्ड, पारिवारिक जिम्मेदारियां और कार्यवाही पूरी होने में 16 साल की देरी जैसे कम करने वाले कारकों का हवाला दिया गया।
याचिका का विरोध करते हुए हरियाणा सरकार ने इसे खारिज करने की मांग की। हालांकि सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए कोर्ट ने सजा को कम करने का निर्णय लिया। कोर्ट ने कहा कि किसी आपराधिक मामले को अनुचित अवधि तक लंबा खींचना अपने आप में एक प्रकार की पीड़ा है। उन्होंने ऐसी देरी को मानसिक कारावास के रूप में वर्णित करते हुए कहा कि इससे अभियुक्त को कष्ट और पीड़ा होती है। कोर्ट ने कहा कि याची जो अब 50 वर्ष का है, 16 वर्षों से अधिक समय से कानूनी कार्यवाही का सामना कर रहा है और उनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। यह देखते हुए कि लंबी प्रक्रिया ही दंड के समान है अदालत ने उनकी सजा को पहले से ही बिताई गई अवधि तक कम कर दिया।