भिवानी। क्या कोई स्कूल ऐसा भी हो सकता है जहां बंदरों के डर से शिक्षक और बच्चे कमरों और लोहे की जाली लगी गैलरी में कैद हो जाए। बंदरों के खौफ से अभिभावक बच्चों का स्कूल ही छुड़वा दें। ऐसा ही स्कूल है गांव कौंट का मॉडल संस्कृति प्राथमिक पाठशाला व राजकीय कन्या उच्च विद्यालय। यहां बंदर अब तक 24 बच्चों और स्टाफ सदस्यों को अपना शिकार बना चुके हैं। एक बच्चे को बंदरों ने इतनी बुरी तरह से जख्मी किया कि अभी तक उसका घर पर ही उपचार चल रहा है। बंदरों के डर से 21 बच्चों के अभिभावकों ने एसएलसी लेकर अन्य स्कूलों में प्रवेश दिलाया। अभी भी हालात ये है कि बच्चों की छुट्टी के समय शिक्षक हाथों में डंडे लेकर बच्चों को स्कूल गेट के बाहर तक छोड़कर आते हैं।
शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित गांव कौंट की मॉडल संस्कृति प्राथमिक पाठशाला और इसी परिसर में चल रहे राजकीय उच्च विद्यालय में बंदरों का आतंक बना हुआ है। यह परेशानी एक-दो दिन से नहीं, बल्कि पिछले करीब पांच साल से है। चार साल पहले शिक्षकों, स्टाफ ने बंदरों को पकड़वाने की मांग उठाई, तो पकड़ने का ठेका भी दिया गया। मगर, आधे बंदरों को ही पकड़कर जंगलों में छोड़ा गया। आधे बचे बंदरों के कारण अब पहले से भी ज्यादा आबादी इनकी हो चुकी है। बंदर स्कूल भवन की छतों और पिछले हिस्से में डेरा डाले रहते हैं। यहां पास ही पानी के टैंक और स्कूल की पानी की टंकी है। नतीजतन यहीं पर इन्हें खाने-पीने की सारी चीजें मिल रही है। प्राथमिक पाठशाला में 227 बच्चे हैं। 21 बच्चों ने पिछले दिनों ही स्कूल छोड़ दिया।
आस्था पड़ रही भारी, समस्या बढ़ी
यहां आस्था भी भारी पड़ रही है। बंदरों को केले, मंगलवार को चूरमा खिलाना शुभ माना जाता है। ऐसे में अधिकतर ग्रामीण स्कूल परिसर या स्कूल भवन की छतों पर ही केले, चूरमा व अन्य फल डाल जाते हैं। जिस कारण अब स्कूल परिसर बंदरों को खासा रास आ रहा है। स्कूल स्टाफ ने ग्रामीणों से भी इस समस्या के समाधान के लिए विचार-विमर्श किया, मगर कोई समाधान नहीं निकला। कार्यकाल पूरा होने के कारण फिलहाल सरपंच हैं नहीं।
पिछले एक सप्ताह में ही 10 से अधिक शिकार
बंदर पानी पीने के लिए जाने वाले बच्चों, महिलाओं को आसानी से शिकार बना रहे हैं। पिछले सप्ताहभर में ही 10 से अधिक लोग बंदरों के शिकार हो चुके हैं। स्कूल से छात्रा पलक, योगिता, आशीष के अलावा स्टाफ सदस्य मायापति, आंगनबाड़ी वर्कर संतोष, कूक सुनीता, आश्विक को बंदर काट चुके हैं।
बंदरों की बड़ी समस्या है। बच्चों को पढ़ाने के साथ बंदरों से बचाना बड़ी चुनौती है। अगर किसी बच्चे को बाथरूम जाना हो तो एक उसके साथ डंडा लेकर सुरक्षा के रूप में जाता है। यहां हर समय हाथ में डंडा रखना पड़ता है। पहले यहां रंग-रोगन के लिए बजट आया था, जो बच्चे के लिए गैलरी में जालियां लगवाई गई, ताकि बंदर न आ सके। यहां बंदरों से बचाव के लिए सभी प्रयास कर लिए, मगर ये जाते ही नहीं।
अजय कुमार, प्राइमरी हेड टीचर, मॉडल संस्कृति प्राथमिक पाठशाला
बंदरों की बड़ी समस्या है। स्टाफ के पांच-छह सदस्यों को बंदर काट चुके हैं। काफी बच्चे भी शिकार हो चुके हैं। कब हमला कर दे कुछ नहीं पता।
सुनीता, ईएसएचएम
मैं यहां बनाए आंगनबाड़ी केंद्र में कार्यरत हूं। पिछले दिनों बंदर ने काट लिया। अचानक हमला करते हैं। ऐसे में सभी में बंदरों का खौफ है।
संतोष, कूक
30-40 बंदरों का पूरा ग्रुप है, जो एक साथ आते हैं और पता नहीं लगता कब हमला कर दें। ऐसे में हर समय खौफ बना रहता है। यहां काफी गर्भवती महिलाएं भी आंगनबाड़ी केंद्र पर आती हैं। ऐसे में बड़ा खतरा है।
अंगूरी देवी।