भिवानी। मैं डोबी वाला तालाब हूं, मुझसे भिवानी का अस्तिव जुड़ा है। कागजों में मैं जोहड़ से झील बन चुका हूं। दशकों बीत जाने के बाद भी अब सिर्फ अपने अंदर गंदा पानी समेटे हूं। मेरी दुर्दशा की कहानी में आप सबकी मेहरबानी है, क्योंकि मुझे इस हालत में पहुंचाते-पहुंचते कई दशक बीत चुके हैं।
भिवानी की प्राचीन ऐतिहासिकता को समेटे डोबी तालाब अब न केवल बदहाल पड़ा है, बल्कि इसके आसपास की भव्यता और प्राचीन धरोहरों को भी वक्त के थपेड़ों और अवैध कब्जाधारियों ने नेस्तनाबूद कर दिया है। अब ये तालाब सिर्फ नाम का डोबी तालाब है, जो अपने अस्तित्व को बचाने के लिए खुद चीख चीखकर गुहार लगा रहा है।
भिवानी शहर का इतिहास भी बड़ा दिलचस्प और रोचकता से भरा है। इतिहास के जानकारों के अनुसार भिवानी की स्थापना 26 फरवरी 1376 में हुई थी। महाराजा नीमपाल ने भिवानी शहर की स्थापना की थी। भिवानी के जगतनारायण भारद्वाज का कहना है कि महाराजा नीमपाल की दो बेटे थे। एक नीम सिंह और बांछू। नीमपाल सिंह से जुड़कर आगे चलकर पहले भ्याणी, फिर भवानी और अब भिवानी का अस्तित्व बना। जबकि बांछू के नाम से बिछवाना जोहड़ जो आज भी भिवानी में मौजूद है, उनके नाम से जुड़ा था।
बांछू के दो बेटे जोनपाल और महीपाल। महीपाल को जोहड़िया यानी छोटा जो बाद में बाबा लोहड़पीर और वीर दोनों के नाम से विख्यात हुए। लोहड़ पीर बाबा ने डोबी तालाब के किनारे ही अपनी तप और कर्म स्थली बना लिया था। डोबी तालाब के किनारे आज भी बाबा लोहड़ पीर का भव्य मंदिर हैं, जो दूर-दूर तक लोगों की गहरी आस्था से जुड़ा है। भिवानी में जोनपाल और लोहड़ का काफी इलाका आज भी राजस्व विभाग के रिकार्ड में जोनपाल और लोहड़ के नाम से ही पहचाना जाता है।
जगतनारायण बताते हैं कि भिवानी बसने से पहले ही जोबी तालाब जोहड़ वजूद में था। भिवानी का अस्तित्व तब बना तो डोबी तालाब के आसपास का इलाका विकसित होने लगा था। प्राचीन काल में डोबी के आसपास दर्जनभर से ज्यादा कुएं थे, जिनका पानी ही लोगों की प्यास बुझाता था। आज जोहड़ के पास कोई कुआं नहीं है। दशकों तक ये जोहड़ बारिश और शहर के पानी को समेटने के साथ साथ रोजमर्रा की जरूरतों को पूरी करने का एक केंद्र भी बना। लेकिन अब ये जोहड़ सिर्फ अपने अंदर गंदा पानी ही समेटे हैं।
छह जोहड़ों को बनाया था 2015 में झील, साढ़े दस करोड़ भी खर्चे
भिवानी शहर के छह प्राचीन जोहड़ों को झील के रूप में विकसित करने और उनका सुंदरीकरण करने की घोषणा 2015 में हुई थी। इसके बाद प्रदेश सरकार से करीब साढ़े दस करोड़ का बजट भी आया और जीर्णोद्धार पर खर्च किया। मगर इसके बावजूद भी डोबी तालाब की सूरत नहीं बदली। इन जोहड़ों में नूनसर जोहड़, मूलचंद जोहड़, डोबी तालाब भी शामिल था। इन जोहड़ों की चाहरदीवारी कराकर इनके अंदर गंदे पानी की निकासी कराकर इन्हें साफ और स्वच्छ बनाने के साथ बाहर पगडंडी का निर्माण कराना जाना था। आसपास पार्क, झूले, बैठने की व्यवस्था, पेड़ पौधे और भ्रमण के लिए सुंदरीकरण भी किया जाना था। जोहड़ की चाहरदीवारी तो हुई मगर महज कुछ एकड़ हिस्से की, क्योंकि अधिकांश डोबी तालाब का क्षेत्र अवैध कब्जों की जहड़ में आ चुका था।
कभी डोबी से होती थी भिवानी की पहचान, आज बदहाल
शहर के जैन चौक क्षेत्र निवासी महावीर प्रसाद डालमिया का कहना है कि बचपन में जब हम डोबी पर जाते थे तो यहां का नजारा भव्य होता था। आसपास काफी कुएं और मंदिर थे, इसी वजह से भिवानी को छोटी काशी का नाम मिला था। आज भी डोबी के आसपास काफी मंदिर हैं, इनमें लोहड़ पीर बाबा का मंदिर आस्था का केंद्र है। मंदिर से पहले ही ये तालाब यहां था। मगर नगर परिषद प्रशासन और सरकार की अनदेखी से ये जोहड़ न केवल अपनी प्राचीनता खो बैठा, बल्कि अस्तित्व भी खतरे में आ गया है। इसे बचना बहुत जरूरी है, क्योंकि ये भिवानी की पहचान और शान है।
बजरंग बली कॉलोनी वासी पूर्व जिला पार्षद व पूर्व नगर पार्षद ईश्वर मान का कहना है कि डोबी तालाब भिवानी बसने से पहले का है। भिवानी में कभी 200 से अधिक मंदिर होते थे, ये मंदिर किसी प्राचीन तालाब या बावड़ी के किनारे हैं। इसी तरह बाबा लोहड़ पीर का मंदिर भी डोबी तालाब के किनारे हैं, अन्य मंदिर भी यहां आसपास हैं। जिनसे शाम को पूजा के समय जोहड़ के आसपास काफी रौनक रहती थी, मगर आज यहां विरानी और अंधेरा छाया है। जोहड़ के आसपास की जमीन लोगों ने कब्जा ली है, जोहड़ सिकुड़कर महज डेढ़ एकड़ में रह गया है, जबकि ये जोहड़ करीब 10 से 15 एकड़ के दायरे में होता था। जोहड़ के अंदर गंदा पानी और कचरा फैला है, जिसकी मानों कई सालों से सफाई तक नहीं कराई है।
नगर परिषद ने शहर के छह प्राचीन जोहड़ों और झीलों के सुंदरीकरण के कार्य के लिए 24 लाख रुपये में टेंडर कराकर वर्कऑर्डर अलॉट करा दिए हैं, जल्द ही जोहड़ों और झीलों का सुंदरीकरण किया जाएगा। डोबी तालाब की चाहरदीवारी हो चुकी है। जबकि इसके आसपास के इलाके को विकसित भी कराया जाएगा। बाबा लोहड़पीर मंदिर का प्राचीन डोबी तालाब शहर की पहचान है, इस धरोहर को संभाले रखना हम सबका दायित्व है।
-भवानी प्रताप सिंह, चेयरपर्सन प्रतिनिधि नगर परिषद, भिवानी।