जूई। सन 1920 के आसपास जब क्षेत्र में बहुसंख्यक लोग फूस से बनी झोपड़ियों में रहते थे, उस समय जूईकलां का ऐतिहासिक कुआं आसपास के गांवों की प्यास बुझाता था। इसके पनघट पर सुबह-शाम पनिहारियों का जमघट सा लगता था लेकिन आज यह ऐतिहासिक धरोहर वीरान और सुनसान पड़ी है। जूई कलां में बना इस कुएं के आकार का कुआं, आज प्रदेश में शायद ही कोई दूसरा बचा होगा। क्षेत्र के सबसे बड़े कुएं का व्यास करीब 7 मीटर है। इसके बावजूद लोग इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण को लेकर गंभीर नहीं हैं।
100 फीट से ज्यादा थी कुएं की गहराई
देश प्रदेश में कुएं बावड़ी बनवाने का काम राजा महाराजा व सेठ साहूकार करते थे। हमारा क्षेत्र रेतीला था, पानी का बड़ा मोल था। इलाके में तब कोई कुआं नहीं था। प्यास बुझाने के लिए बरसात पर आधारित जोहड़ पर अधिकांश लोग निर्भर थे। उस समय जूई के सेठ रूपचंद ने इस कुएं का निर्माण इस सोच के साथ किया था कि ग्रामीणों की प्यास को बुझाई जा सकेगी। इस कुएं की गहराई 100 फीट से भी ज्यादा थी। उस समय इस कुएं से ऊंटों के माध्यम से पानी निकाल कोठे यानि मुख्य हौद पानी के भरे जाते थे। कोठे से पानी हौद में आता था जिसको पशु पीते थे। समय के साथ सेठ पूरणमल व उनके पुत्र राजेन्द्र सिंह ने 1960 के आसपास कुएं पर इंजन लगवा दिया था जिसके चलने से इलाके में पानी की समस्या का समाधान करने में मदद हुई थी। वर्तमान में कुएं में देखरेख के अभाव में पानी नाम मात्र रह गया है। सेठ परिवार के युवा आशीष और अनूप कहते हैं कि अगर सरकार इस कुएं को धरोहर के रूप में विकसित करना चाहे तो हम देने को तैयार हैं। जो भी सहयोग बन पड़ेगा, वह भी देने को तैयार हैं। गांव के सरपंच पवन रापड़िया बताते हैं कि ये सेठ लोगो की निजी सम्पति है। बाकी सरकार इसे धरोहर के रूप में सहेजे तो आने वाली पीढ़ियों को भी बुजुर्गों द्वारा बनाई गई इस कृति से रूबरू होने का अवसर मिलेगा।
कुएं के तरफ नहीं जाने देते थे बुजुर्ग : कर्ण सिंह
71 साल के कर्ण सिंह रापड़िया बताते हैं कि जब वह छोटे थे तो परिवार के बुजुर्ग लोग कुएं की तरफ जाने भी नहीं देते थे। चोरी छिपे जाकर उसमें बने कोठे के पानी मे नहाकर आते थे। उस टाइम इतना जमा पानी कहा नसीब था। मेरी याद में इंजन से कोठे पानी के भरे जाते थे। उससे पहले ऊंटों से पानी निकाला जाता था।
ऐसा कुआं कहीं और नहीं देखा : रामफल समोता
जूई के 59 साल के रामफल समोता बताते हैं कि रेगिस्तान जैसे इस इलाके में इस तरह की अनूठी चीज अपने आप में एक मिसाल है। पहले इस कुएं से ऊंटों से पानी निकाल ग्रामीण ले जाते थे। बुजुर्गों से सुना है सेठ साहूकारों ने आजादी के कुछ सालों बाद इसपर इंजन लगवा दिया था तब से इसका नाम इंजन वाला कुआं पड़ गया। बाकी इस जैसा ओर कोई कुआं मिलना मुश्किल है।
कुएं के नीचे तक बनी हुई है सीढ़ी : महिपाल रापड़िया
75 साल के महिपाल सिंह रापड़िया बताते हैं कि बचपन में इस कुएं पर खूब नहाया करते। उस समय इस कुएं का कोठा स्विमिंग पूल का काम किया करता था। इस कुएं में ऊपर से नीचे तक सीढ़ी भी बनी हुई है जो आज भी यथावत हैं।