तेरह नियमों को पालन करने वाला जैन संन्यासी : मुनि किशनलाल
तोशाम।
अक्षय तृतीय के पर्व पर मुनिश्री किशनलालजी ने कहा है कि जैन संन्यासी वही होता है जो पांच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुप्ति इन 13 नियमों का पालन करता है। अहिंसा नियम के अंतर्गत जैन साधु भोजन नहीं बनाते वह भिक्षा से भोजन ग्रहण करते हैं। मुनिश्री ने कहा आज भी जैन सन्यासी के लिए भोजन नहीं बनता है। गृहस्थी के घर जो बना हुआ भोजन है उनमें से थोड़ा लेकर अपनी जीवन चर्या चलाते हैं। साधु जीवन में कष्ट आता है उसे सम भाव से सहन करते हैं। आज भी तेरापंथ में साधुचर्या के 13 नियम का पालन करते हैं। मुनिश्री ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की दीक्षा उसके माता-पिता की लिखित और मौखिक स्वीकृति के पश्चात ही हजारों लोगों के बीच दी जाती है। कोई बालक अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपने पूर्वजन्मों के संस्कारों से प्रेरित हो सोच-समझ इच्छा से दीक्षित होता है। उस पर किसी का कोई दबाव नहीं होता। किसी धर्म की विधि को स्वीकार करना भारत के संविधान की स्वीकृति है, कोई उसमें बाधा डालता है। यह उसकी स्वतंत्रता का हनन है फिर चाहे वह कोई व्यक्ति या संस्था है।