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रुद्राक्ष की महिमा बहुत विचित्र : राकेश शर्मा

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​शिव महापुराण कथा में पहुंचे श्रद्धालु। संवाद
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अंबाला सिटी। जट्टांवाला प्राचीन शिव मंदिर में शिव महापुराण कथा के तीसरे दिन आयोजन किया। बुधवार को कथा में पंडित राकेश शर्मा ने रुद्राक्ष के बारे में बताया कि रुद्राक्ष किस प्रकार से भगवान भोलेनाथ के आंसुओं से प्रकट हुई।
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रुद्राक्ष की महिमा बहुत विचित्र है। सहस्त्र वर्ष पहले जब सहस्त्र वर्षों तक तप करने के बाद भी शिवजी को संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने अपनी लीला के वशीभूत होकर नेत्र बंद कर लिए। उस समय उनके नेत्रों से जल के कुछ कण पृथ्वी पर गिरे और वे रुद्राक्ष के रूप में उत्पन्न हुए। अयोध्या, मथुरा, लंका, मलयाचल, काशी अहाद्रि में पैदा होने वाले रुद्राक्ष शिवजी के चारों वर्णों और विष्णु के भक्तों को दे दिए। शिवजी ने ही रुद्राक्ष की अनेक जातियों का विधान किया। आंवले के परिमाण वाला रुद्राक्ष की अनेक जातियों का विधान किया। आंवले के परिमाण वाला रुद्राक्ष सर्वोत्तम माना।
बद्रीफल जैसे मध्यम और चने के आकार वाला अधम माना।आंवलें के आकार वाला रुद्राक्ष अरिष्टनाशक और दूसरा सौभाग्य वर्धक तथा तीसरा सिद्धिदायक होता है। स्वयं छिद्र रुद्राक्ष बहुत अच्छा होता है। 1100 रुद्राक्षों को धारण करने वाला महान् भक्त और 300 रुद्राक्षों को तीन सूत्री यज्ञोपवीत के रूप में धारण करने वाला पवित्र आत्मा और 108 रुद्राक्षों को धारण करने वाला दृढ़वती कहलाता है।
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यह विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि रुद्राक्ष धारण किए बिना शिव नाम की भक्ति फलदायक नहीं होती। रुद्राक्ष के एक से लेकर 14 तक मुख होते हैं। एकमुखी रुद्राक्ष शिव रूप होता है और मुक्ति और भक्ति प्रदाता है। द्विमुखी रुद्राक्ष पापनाशक होता है। त्रिमुखी सिद्धिदायक होता है और चातुर्मुख फलदायक होता है। इस तरह रुद्राक्ष के जितने मुख होंगे, उनको धारण करने वाला उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता जाएगा।
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