अंबाला सिटी। नौ माह बाद हुई नगर निगम सदन की बैठक में वीरवार को जमकर हंगामा हुआ। यहां तक कि बैठक से एक शाम पहले मिले एजेंडे और बहुत से पार्षदों के प्रस्तावाें को एजेेंडे में शामिल न करने के विरोध में पार्षदों ने बैठक के दौरान नारेबाजी भी की। इससे बौखलाए अधिकारियों ने जवाब देते हुए मेयर के माध्यम से मौके पर ही सभी पार्षदों के प्रस्तावाें को एजेंडे में शामिल कर बैठक शुरू करवाई। वहीं, एकजुट दिखे पार्षदों ने अधिकारियों को विभिन्न मसलों पर घेरा और उनके प्रस्तावों को एजेंडे में शामिल न करने, पुराने विकास संबंधी काम पूरे न होने इत्यादि मसलों पर सवाल उठाए।
इतना नहीं पार्षद मिथुन वर्मा ने तो निगम आयुक्त से यह तक कह दिया कि वह बैठक से पहले विभिन्न मुद्दों पर होमवर्क करके आया करें। इसी दौरान जवाब के उत्तर मिलने पर भी हो रही देरी पर भी मनोनीत पार्षद संदीप सचदेवा ने अधिकारियों को पूरी तैयारी करके बैठक में आने को कहा। हुआ यूं था कि पार्षद द्वारा नियमों का हवाला देते हुए निगम हाउस की बैठक को असंवैधानिक करार दिया जा रहा था। इस दौरान वहां मौजूद निगम आयुक्त नेहा सिंह ने नियम बताते हुए इस बैठक को पूरी तरह से संवैधानिक बताया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किस तरह से यह बैठक संवैधानिक है और साथ ही बताया कि यह बैठक नियमों के अनुसार ही हो रही है। इस दौरान उन्होंने पार्षदों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वह नियमों को पहले पढ़कर आएं। इससे पार्षद बिफर गए और आयुक्त को एक्ट में से ही नियम को पढ़कर सुनाया कि किस तरह से बैठक पूरी तरह से असंवैधानिक है।
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पार्षद बोले, उनके फोन नहीं उठाते अधिकारी
गंदा पानी आने की समस्या पर वहां मौजूद एक पार्षद ने शिकायत की। इस दौरान वहां मौजूद संबंधित अधिकारी ने शिकायत न मिलने की बात कही। इसके बाद अन्य पार्षद ने कहा कि अधिकारी उनके फोन नहीं उठाते हैं। इस पर संबंधित अधिकारी ने जवाब देते हुए कहा कि वह सभी के फोन उठाते हैं, परंतु इतने में एक दो नहीं, बल्कि करीब पांच पार्षदों ने कहा कि अधिकारी उनके फोन भी नहीं उठाते हैं। पार्षदों द्वारा बढ़ते विरोध और सवालों को देखते हुए अधिकारी ने अपनी गलती मानी और फोन उठाने का आश्वासन दिया।
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पार्षदों ने मांगा फंड, आयुक्त ने किया इंकार
पार्षदों द्वारा विकास कार्य के लिए करीब 50 लाख रुपये प्रति वार्ड देने की उठाई गई। मांग को आयुक्त ने यह कहकर नकार दिया कि निगम के पास इतने रुपये ही नहीं है। आयुक्त की यह बात सुनते ही सभी पार्षदों का पारा चढ़ गया और पार्षदों ने उनके वार्डों में एक के बाद एक चल रहे लाखों रुपये के गैर जरूरी कार्यों और उनके टेंडर को गिनाते हुए कहा कि इन कार्यों के लिए फंड कहां से आ रहा है। उन्होंने कहा कि नगर निगम अपनी मर्जी से चाहे जितने मर्जी बढ़े टेंडर जारी कर देता है, परंतु जब पार्षदों द्वारा लोकहित में रुपयों की मांग की जा रही है तो उनका खजाना पूरी तरह से खाली है। अगर निगम का खजाना ही खाली है तो ऐसी बैठक का क्या फायदा, जिसमें एजेंडों पर काम ही न हो सके।
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पार्षद बोले, दलालों के 15 मिनट में होते हैं काम, आमजन परेशान
बैठक में पार्षदों ने निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर जमकर सवाल उठाएं। इस दौरान उन्होंने कहा कि निगम में दलालों का पूरा बोलबाला है। अगर कोई दलाल की मदद से काम करवाता है तो उसका काम 15 मिनट में हो जाता है, परंतु आमजन तो पार्षदों तक को धक्के खाने पड़ते हैं। स्थिति यह है कि दलालों की मदद से अवैध क्षेत्रों में भी एनडीसी दे दी जाती है और आमजन को वैध क्षेत्रों में भी एनडीसी नहीं दी जाती है और लोगों को धक्के खाने पड़ते हैं। इसके समाधान के लिए सीएससी सेंटर निगम में खुलवाने और सिटीजन चार्टर लागू करने की मांग की। पार्षदों द्वारा बैठक में कई ऐसे मांगों को गिनवाया गया जो काफी समय से उठाए जा रही हैं। ऐसे में मेयर शक्तिरानी ने कहा कि वह स्वयं भी इस बात से खफा है और वह अधिकारियों से जवाब तलब कर चुकी हैं। अगर जल्द ही अधिकारियों द्वारा इस पर जवाब नहीं दिया जाता है तो स्वयं कार्रवाई को लेकर पत्र लिखेंगी। इससे कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
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निंदा प्रस्ताव की मांग
बैठक में अधिकारियों की कार्रवाई से खफा पार्षदों ने कई बार निंदा प्रस्ताव लाने की मांग की परंतु इस पर कुछ सहमति नहीं बन सकी। इसको लेकर मेयर ने मौके पर ही आयुक्त से बात की और आयुक्त से आश्वासन लिया कि आगे से बैठक में जिन भी चीजों की सहमति बनती है उन पर अमल किया जाएगा।
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बहुत से मुद्दों का जवाब नहीं दे पाए अधिकारी
अतिक्रमण, पानी निकासी, स्ट्रीट लाइट व्यवस्था, बेसहारा गोवंश आदि मुद्दों पर अधिकारी जवाब ही नहीं दे सके। यहां तक कि स्ट्रीट लाइट लगाने वाले मुद्दे पर तो अधिकारियों ने सीधे ही पल्ला झाड़ दिया कि वह स्ट्रीट लाइटें नहीं लगा सकते हैं। इसके अलावा अन्य मुद्दों पर भी कुछ खास उत्तर पार्षदों को नहीं मिल सका।