अंबाला सिटी। अपराध होने के बाद अदालत में साबित करना बड़ी चुनौती है। सुनवाई के दौरान अंबाला के दो मामलों में पुलिस ही दांवपेंच में फंस गई और कोर्ट को आरोपियों को बरी करना पड़ा। इसमें से एक मामला कैंट में पुलिस पर हमले से जुड़ा था, जिसमें पुलिसकर्मी की पिटाई होने और वर्दी फाड़ने के आरोप कोर्ट में साबित नहीं हो सके।
दूसरे मामले में एक ढाबे पर मिले बाल मजदूर बच्चों को रेस्क्यू करने के बाद जब पुलिस केस हुआ तो पुलिस उन बच्चों की आयु से संबंधित जानकारी ही नहीं दे सकी। ऐसे में दोनों मामलों में आरोपियों को निचली अदालत ने आरोप मुक्त कर दिया।
पहला मामला
बाल मजदूरों की उम्र नहीं हुई साबित
26 जून 2018 को लालकुर्ती चौकी में शिकायत दर्ज की गई थी, जिसमें बताया कि राज्य संयोजक पंचकूला पुनीत शर्मा और जिला बाल संरक्षण अधिकारी मेघा सिंगला के साथ लालकुर्ती बाजार में बाल श्रम को लेकर औचक निरीक्षण किया गए थे। इसमें कुछ दुकानों पर चार नाबालिग बच्चे बाल मजदूरी करते हुए मिले थे।
इस मामले में चार दुकानदारों के खिलाफ केस दर्ज किया था। बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता मान सिंह काकरान व अधिवक्ता नितेश साहनी ने बताया कि इसके बाद जब मामला कोर्ट पहुंचा तो दुकानदारों की तरफ से अधिवक्ता ने कोर्ट में दलीलें पेश की। जिसमें कोर्ट को बताया कि पुलिस ने जो नाबालिग बच्चे बताए हैं उनकी उम्र का कोई सुबूत नहीं है। इसमें पुलिस ने एक नाबालिग का सिर्फ एक आधार कार्ड दिखाया था, जबकि आधार कार्ड उम्र का एक पुख्ता सुबूत नहीं है।
इसके बाद कोर्ट ने सभी बच्चों की उम्र से जुड़ा सुबूत दिखाने को कहा और ओसिफिकेशन टेस्ट भी कराने के निर्देश दिए। पुलिस ने लंबे समय बाद कोर्ट में जवाब दिया कि बच्चों से जुड़ी जानकारी नहीं मिल पाई है और बच्चों का भी पता नहीं लग सका है। ऐसे में एडीजे फलित शर्मा की कोर्ट ने चारों आरोपियों को आरोप मुक्त कर दिया।
दूसरा मामला
यह मामला भी लालकुर्ती चौकी से जुड़ा है। इसमें 27 मार्च 2019 को ईएचसी सुखविंद्र सिंह ने लालकुर्ती चौकी प्रभारी को शिकायत की थी कि वह और एसपीओ मंजीत सिंह अंबाला कैंट में वाहनों को चेक कर रहे थे। तभी एक स्कूटी पर दो लड़के आते दिखाई दिए। उन्हें रोककर कागज मांगे तो वह दिखा नहीं पाए। चालान करने लगे तो इन लड़कों ने अपने दो साथियों को बुला लिया। इसके बाद जो लड़के आए वह इन लड़कों को ले जाने लगे। जब दोनों पुलिस कर्मियों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो लड़कों ने उसके साथ मारपीट शुरू कर दी। जिससे सुखविंद्र की नाक से खून निकलने लगा और उसकी वर्दी भी फाड़ दी। बचाव पक्ष के अधिवक्ता वरिष्ठ अधिवक्ता मान सिंह काकरान और अधिवक्ता पुनीत सरपाल ने कोर्ट को दलीलें दी कि हेड कांस्टेबल को क्या चालान काटने की पावर है, जोकि नहीं होती है। वहीं ब्लड ग्रुप लिया था उसमें ह्यूमन लिखा था, जबकि ब्लड ग्रुप का एबीसी नहीं था। वहीं सरकारी कार्य में बाधा भी प्रूव नहीं हो सकी। वहीं वर्दी फाड़ने के मामले में भी पुलिस यह साबित नहीं कर पाई वह वर्दी पुलिस विभाग ने दी थी। इसके साथ ही डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट भी कानूनी रूप से पूरक नहीं थी। क्योंकि डीएनए टेस्ट की 99.9 प्रतिशत ही एक्यूरेसी होती है 100 प्रतिशत एक्यूरेसी नहीं होती। वहीं नाक का फ्रेक्चर की रिपोर्ट देने वाला चिकित्सक भी नागरिक से चला गया जो कि नहीं मिला इसलिए फ्रेक्चर भी साबित नहीं हो सका। इन्हीं कमियों के कारण तीनों आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया।