अंबाला। वो दौर था बेचैनी और उत्तेजना का। दरअसल वर्ष 1857 तक अंग्रेजों के अत्याचारों को झेलते हुए भारतवासियों की करीब आधी सदी गुजर रही थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के कुशासन के प्रति भारतीयों के भीतर विद्रोह पनप रहा था मगर भारत के कुछ गद्दार प्रवृति के लोगों की कृपा से अंग्रेज उस विद्रोह को अपनी रणनीति के बूते आसानी से दबाने में सफल हो जाते थे।
अंबाला में भी यही हुआ। तब एक भारतीय ब्रिटिश सैनिक शाम सिंह ने राष्ट्र के प्रति अपना कर्तव्य निभाने की बजाय अंग्रेजों के साथ वफादारी निभाते हुए भारतीय सेना के विद्रोह की योजना की जानकारी अंग्रेज अधिकारियों के कानों तक पहुंचा दी थी। यही वजह रही कि अंबाला छावनी के जिन भारतीय सैनिकों ने पूरी तैयारी के साथ अंग्रेजों को मौत के घाट उतारने की रणनीति तैयार की थी, उस विद्रोह को उन्हीं के एक साथी शाम सिंह की बदौलत ढेर समझौते के पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया।
राजकीय पीजी कालेज अंबाला छावनी में इतिहास के प्रोफेसर डा. अतुल यादव के मुताबिक अंबाला उस दौर में हरियाणा का एकमात्र बड़ा नगर था और जहां काफी बड़ी सैनिक छावनी थी। यहां हर मैजिस्टी का नौवां रिसाला, 4 वां बंगाली रिसाला, 5 बंगाली देसी पलटन, 60वीं बंगाली देसी पलटन, दो ट्रूप घुड़सवार तोपखाना (यूरोपीय) समेत पंजाब और उत्तर पश्चिमी प्रांत (आधुनिक उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड) के सभी सैनिक अड्डों की बहुत सारी सैनिक टुकड़ियां भी एन फील्ड राइफलों के प्रयोग का परीक्षण लेने के लिए यहां आई हुई थी। इन सभी सैनिकों में नए कारतूसों को लेकर बेचैनी थी। यही कारतूस आगे चल कर विद्रोह की सबसे बड़ी वजह बने।
डा. यादव के मुताबिक तब अंबाला छावनी में यूरोपीय और भारतीय सैनिक थे। इनमें भारतीय सैनिक चर्बी वाले कारतूसों को वापस लेने के लिए अंग्रेज अधिकारियों से मिले थे, लेकिन अंग्रेज अधिकारियों ने कोई कदम नहीं उठाया था। इसके बाद ही भीतर ही भीतर विद्रोह की योजना बनाई जाने लगी थी। नतीजन योजनानुसार ही 10 मई 1857 को ठीक समय पर जबकि अंग्रेज लोग गिरजाघर में प्रार्थना के लिए जाएंगे, तो 60 वीं और पांचवीं बंगाली देसी पलटन अपने अपने शस्त्रागार पर अधिकार कर लेंगी। घुड़सवारों का चौथा दस्ता तोपों पर कब्जा करेगा और हर मैजिस्टी के नौवां रिसाला पर हमला कर उसके घोड़ों को भगा देगा। फिर कत्लेआम कर अंग्रेज राज के अवशेषों को समाप्त कर दिल्ली की ओर बढ़ेंगे। अंबाला के इन सैनिकों ने दिल्ली और मेरठ की छावनियों में सैनिकों से तालमेल बना लिया था। इस बात की पुष्टि पंजाब के तत्कालीन चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस, ज्यूडिशियल कमिश्नर मांटगुमरी, दिल्ली के बादशाह के हकीम एहसान उल्लाह खां तथा मिर्जा गालिब आदि के पत्राचार और लेखों से होती है।
इसलिए कहा जाता है कि अंबाला छावनी का विद्रोह केवल सैनिकों तक ही सीमित रहा। इसकी बड़ी वजह यह बताई जाती है कि अंबाला के सैनिकों की यह योजना लीक हो गई थी। एक सैनिक शाम सिंह ने इस बात की अपने अंग्रेज हाकिमों तथा उपायुक्त को अप्रैल में ही खबर दे दी थी कि मई के आरंभ में सिपाहियों का एक विद्रोह होगा और अंबाला में कई स्थानों पर यूरोपीय सैनिकों का खून बहेगा। इससे अंग्रेज सेनाधिकारी चौकस हो गए और भारतीय सैनिकों को अपनी योजना का भेद खुलने की खबर नहीं लगी। योजना के अनुसार मेरठ में क्रांति होने से पहले 10 मई 1857 ईस्वी को नौ घंटे पहले अर्थात रविवार को सुबह नौ बजे 60वीं स्वदेशी पैदल सेना की टुकड़ी ने अंबाला में विद्रोह कर दिया। अंग्रेज इस घटना से निपटने के लिए पहले ही तैयार थे। खते ही देखते, 60वीं पलटन पूरी तरह अंग्रेज सैनिकों के घेरे में आ गई और थोड़ी देर बाद पांचवीं पलटन ने दोपहर 12 बजे विद्रोह कर दिया था। इसके बाद नौवां रिसाला ने भी धावा बोल दिया। अंग्रेज सैनिकों ने एक अन्य टुकड़ी को जो मालखाना पर तैनात थी. उसने भी विद्रोह कर दिया। अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें भी घेर लिया।