अंबाला सिटी। प्रेमनगर की रहने वाली रेणु बाला ने ऐसा काम किया कि उसका नाम और काम अमेरिका में चमक रहा है। रेणुबाला ने जूट के बैग बनाने का हुनर सीखा फिर सात समंदर पार तक ख्याति प्राप्त की। उनके बनाए हुए बैग अंबाला से विदेश जाने वाले लोग या अपने चिर-परिचित को उपहार देने को लोग बैग विदेश भी ले जा रहे हैं। अभी भी उनके बैग अमेरिका और कनाडा में भी गए हैं।
इतना ही नहीं खुद पैरों पर खड़ा होने के बाद रेणु अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देकर सबल बना रही हैं। यही कारण है कि सोमवार को उन्हें हिसार के चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कृषि मेले में प्रगतिशील महिला किसान के सम्मान से नवाजा गया है। इस सम्मान को पाने वाली अकेली रेणु ही नही बल्कि दुराला निवासी खुशप्रीत भी हैं। जिन्होंने जैविक खेती को अपनाकर मिसाल कायम की है।
कपड़े के बैग सीलने से हुई थी शुरुआत
प्रेमनगर की रहने वाली 45 वर्षीय रेणुबाला ने बताया कि वह अपने घर में ही पिछले 15 वर्षों से कपड़े के बैग सीलने का काम करती है। उनके दो बेटे एक बेटी है। उनके पति एक प्राइवेट नौकरी करते हैं और वह बैग बनाने का काम करती है। चार वर्ष पहले उन्हें पता लगा कि कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से डॉ. सुनीता आहुजा की देखरेख में जूट के बैग बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।
इसके बाद उन्होंने प्रशिक्षण लेने के बाद जूट के बैग बनाने शुरू किए और घर से ही उनकी बिक्री शुरू कर दी। देखते ही देखते वह अपने काम में इतनी माहिर हो गईं कि उनके बैग लोग विदेश तक लेकर जाते हैं। इतना नहीं कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से गांवों में महिलाओं को प्रशिक्षण देने के लिए नियुक्त किया गया। अब वे विभिन्न गांवों में जाकर महिलाओं को जूट के बैग बनाने का प्रशिक्षण प्रदान करती है जिससे अन्य महिलाएं भी सशक्त हो सकें। प्लास्टिक मुक्त अभियान के तहत भी उन्हें नगर निगम अंबाला की ओर से सम्मानित किया जा चुका है।
कोरोना के बाद बढ़ा खेती में रूझान
दुराला के रहने वाले खुशप्रीत सिंह को भी कृषि मेले में जैविक खेती और सीधी बिजाई की तकनीक अपनाने के लिए सम्मानित किया गया है।उसने बताया कि वह शुरू से ही खेतीबाड़ी के साथ जुड़े हैं। वर्ष 2007 में पिता की मौत के बाद उसने अपनी जमीन को ठेके पर दे दिया था और खुद एक फास्ट फूड एजेंसी चलाने लगे, लेकिन कोरोना के बाद से उसका काम काज प्रभावित हुआ है। इसके चलते उसने खेती की तरफ अपना रुझान बढ़ाया और जैविक सब्जियों को उगाना शुरू किया। इसके साथ ही उन्होंने धान की सीधी बिजाई की तकनीक अपनाकर धान की फसल में होने वाले खर्च और पानी की खपत को भी कम करने का काम किया है। खुशप्रीत 15 एकड़ में खेती करते है। अपने साथ साथ वह दूसरे किसानों को भी जैविक खाद और सीधी बिजाई की तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित कर रहें है। उनसे प्रभावित होकर अब तक 30 किसानों ने इस तकनीक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। खुशप्रीत चार एकड़ में जैविक खाद का इस्तेमाल कर करेला, लौकी, टमाटर सहित अन्य सब्जियां उगा रहे है। उनका कहना है कि हमें जमीन में कम से कम खाद डालना चाहिए। जिससे भूमि की उपजाऊ क्षमता बनी रहे।