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Ambala News: नदियों की खोदाई होती तो एनएचएआई को नहीं खरीदनी पड़ती अधिक दामों पर मिट्टी

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वैभव शर्मा
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अंबाला सिटी। अंबाला में पिछले साल आई बाढ़ ने लोगों का लाखों रुपये का नुकसान किया। इसमें सिर्फ लोगों का ही नहीं, बल्कि सरकारी विभागों को भी काफी नुकसान हुआ। इस बाढ़ का पानी निकलने के बाद तटबंधों को सही कराना प्रशासन के लिए चुनौती बन गया।
इस संबंध में कई उच्चस्तरीय बैठकें भी हुईं। मुख्यालय से अधिकारी आए और बड़ी-बड़ी योजनाएं कागजों पर बनाई। मगर एक छोटी सी बात को सभी ने दरकिनार कर दिया। किसी ने यह सोचा ही नहीं कि बाढ़ के पानी के साथ जो मिट्टी बहकर आई है। उसने नदियों का तलों को ऊंचा कर दिया है। अगर नदियों को गहरा किया जाए तो आने वाले समय में बाढ़ जैसे हालातों से कुछ तो राहत मिल सकती है।
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सिर्फ लोगों को ही राहत नहीं मिलती बल्कि सरकारी विभागों को भी इसका फायदा होता। दरअसल इस समय अंबाला रिंग रोड, अंबाला शामली ग्रीनफील्ड, कोटपुतली से ईस्माइलाबाद ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे का अंबाला में जुड़ाव बड़ी परियोजनाएं अंबाला में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण संचालित कर रहा है। मगर इनमें से कई परियोजनाओं पर पिछले कुछ समय से धीमा काम हो रहा है।
इन परियोजनाओं के धीमे होने का कारण विभाग की कमी नहीं, बल्कि मिट्टी का सीमित मात्रा में उपलब्ध होना है। इस कारण यह परियोजनाएं धीमी चल रही हैं। परियोजनाओं पर धीमी गति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंबाला की महत्वाकांक्षी परियोजना अंबाला रिंग रोड पर अभी तक 15 प्रतिशत ही काम हुआ है। जबकि इसकी डेडलाइन अक्टूबर 2025 में है।

दोगुने दाम पर खरीद रहे मिट्टी

अंबाला रिंग रोड व अन्य परियोजनाओं के लिए कंपनियों ने जो एस्टीमेट तैयार किया था उसकी तुलना में उनकी लागत काफी बढ़ रही है, क्योंकि उन्होंने जिन दामों में मिट्टी खरीदने की बात कही थी वह तो अब दाम है ही नहीं। निर्माता कंपनियों को दोगुने दामों में परियोजनाओं को समय से पूरा करने के लिए मिट्टी खरीदनी पड़ रही है। मिट्टी की कभी उपलब्धता होती है तो कभी नहीं। ऐसे में काम धीमी गति से चल रहा है।
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नदियों की मिट्टी थी उपयुक्त

विशेषज्ञों की मानें तो बाढ़ आने के बाद पानी के साथ आई रेत और मिट्टी उपयुक्त थी। यह मांग भी उठ रही थी कि नदियों को गहरा किया जाना चाहिए। जैसे टांगरी नदी पर वर्षों से खनन ही नहीं हुआ है। यही हाल मुलाना में मारकंडा और बेगना नदी का है। अगर यहां पर खोदाई होती तो जो मिट्टी निकलती उसे एनएचएआई को अपनी परियोजनाओं के लिए प्रयोग करने को दिया जा सकता था। हैरानी की बात तो यह है विभागीय सूत्रों की मानें तो वह इस मिट्टी के लिए संबंधित विभाग को पत्र भी लिख चुके थे। इसके बावजूद इस पर संज्ञान नहीं लिया गया। अब जब दोबारा से मानसून सीजन आ रहा है तो विभाग बाढ़ से बचाव की तैयारी तो कर रहा है तो बाढ़ नुकसान न पहुंचा पाए इसके प्रबंध दिखाई नहीं दे रहे हैं। हालांकि यह निर्णय स्थानीय विभागों से सर्वे कराने के बाद सरकार के स्तर पर लिया जाना चाहिए था। मगर हर बार की तरह अगर इस बार भी पहाड़ों पर अत्यधिक बारिश हुई तो बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि नदियों के तल पहले से ही उठे हुए हैं।



वर्जन

मिट्टी की उपलब्धता कम हाेने के कारण परियोजनाओं में कुछ धीमी गति है। मगर हम डेडलाइन तक कार्य को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।
-आशिम बंसल, परियोजना निदेशक, एनएचएआई




एक दो दिन में ही नदियों की खोदाई का काम शुरू कर दिया जाएगा। एनएचएआई को मिट्टी देनी है या नहीं यह मुख्यालय के स्तर का निर्णय है।
-अमित रघुवंशी, एसई, सिंचाई विभाग
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