नारायणगढ़। नन्हेड़ा गांव में श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन पुष्प मुरारी बापू ने गुरु महिमा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के स्वार्थी युग में अधिकतर लोग धन, संपत्ति, वैभव, संतान और सुख पाने के लिए गुरु के पास जाते हैं। वास्तव में गुरु के पास ईश्वर प्राप्ति व मोक्ष पाने के लिए जाना चाहिए। बापू ने कहा कि एक दिन महाराज परीक्षित राजकीय कार्य से राज्य की सीमा पर व्यस्त थे। इस दौरान राजा के भेष में कलियुग उनके राज्य में प्रवेश करने लगे तो राजा परीक्षित ने उसका परिचय जाना। कलियुग ने अपने गुणों का वर्णन किया। इससे प्रभावित परीक्षित ने उन्हें जुआ स्थल, मदिरालय, पशुओं का वध स्थल और पाप से कमाया हुआ स्वर्ण स्थल पर वास करने की अनुमति दे दी।
राजा परीक्षित उस समय सोने का मुकुट पहने हुए थे। जिसमें कलियुग ने तुरंत प्रवेश कर लिया। राजा परीक्षित जब जंगल में शिकार खेलने गए तो वे ऋषि समिक के आश्रम में गए। उन्हें प्यास लगी तो उन्होंने जल मांगा, परंतु ऋषि ध्यान में होने के कारण जल नहीं दे सके। इससे खफा राजा ने मरे पड़े सर्प को धनुष की नोक से उठा कर तपस्या में लीन ऋषि के गले में डाल दिया। यह समाचार किसी अन्य ऋषि पुत्र ने समिक पुत्र श्रृंगी को बता दिया तो श्रृंगी वहां आए। उन्होंने राजा को श्राप दिया कि जिसने मेरे पिता के गले में मरा हुआ सांप डाला है, वही सांप उसे आज से सातवें दिन डस लेगा और वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। जब ऋषि समिक ध्यान से जगे तो पुत्र ने सारी बात बताई। जिसे सुनकर ऋषि ने ध्यान लगाकर देखा तो सब जान गए।
उन्होंने पुत्र को ऐसा न करने के बारे में समझाया, क्योंकि राजा ने कलियुग के प्रभाव से यह किया था। वह राज दरबार में गए। जब राजा परीक्षित ने मुकुट उतारा तो उन्हें अपने किए पर पछतावा हुआ। इतने में उन्हें ऋषि समिक के आने का समाचार मिला। राजा ने क्षमा मांगी। ऋषि ने परीक्षित के पुत्र जनमेजय का राजतिलक कर दिया। ऋषि मुनियों के साथ परीक्षित के जीवन की रक्षा के लिए विचार करने लगे। उसी समय वहां गुरु शुकदेव पधारे। उन्होंने उन्हें श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया।