cccइन सरकारी संपत्तियों को लीज खत्म होने के बावजूद भी काबिज लोगों के कब्जे में ही रखने के लिए नगर निगम के निचले अफसरों और कर्मचारियों ने कब्जेधारियों से मिलीभगत कर खूब गड़बड़ झाला किया।
लेकिन जांच में ये घपले बाजियां अब सामने आ चुकी हैं। हैरानी की बात यह सामने आई है कि नगर निगम के पूर्व निचले अफसरों व क्लर्कों ने मिलीभगत कर सरकार की बेशकीमती लीज संपत्तियों को फर्जी रसीदें काटकर महज कुछ करोड़ों रुपये में ही दोबारा लीज रेंट पर दे दिया गया।
कैंट में हैं सरकार की काफी लीज संपत्तियां
उल्लेखनीय है कि अंबाला कैंट में अंग्रेजों के कार्यकाल में बहुत से ओल्ड ग्रांट बंगले व जमीनें विभिन्न संस्थाओं और प्रभावशाली लोगों को लीज पर दिए गए थे। इस दौरान कुछ संपत्तियों को तो अनिश्चितकालीन लीज पर दिया गया था और कुछ संपत्तियां निर्धारित वर्षों के लिए लीज पर दी गई थी। निर्धारित वर्षों वाली कुछेक लीज संपत्तियों को कुछेक वर्षों के लिए लीज रेंट पर भी दिया गया था। लेकिन उसके बाद सभी लीज प्रापर्टियों की लीज खत्म हो गई और न ही उन्हें आगे लीज संपत्तियों पर दिया गया। लेकिन ये लीज संपत्तियां आज भी सरकार के कब्जे से बाहर है। इन तमाम संपत्तियां की कीमत अरबों रुपये में हैं।
इस तरह की गई धांधलियां
नियमानुसार जिन लीज संपत्तियों की लीज खत्म हो जाए, उसे स्थानीय प्रशासन अपने कब्जे में ले लेता है। उसके बाद यदि इन संपत्तियों को दोबारा लीज पर दिया जाए, तो इसके लिए स्पेशल केस तैयार होकर वाया डीसी (लीज संपत्तियों के एक्साइज अफसर) हरियाणा सरकार के पास जाता है और वहां सरकार की विशेष अनुमति के इन संपत्तियों को दोबारा लीज पर दिया जाता है।
लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। नगर निगम (पहले नगर परिषद) के कुछ निचले अफसरों व क्लर्कों ने मिलीभगत कर कुछ लीज संपत्तियों का लाभ बरसों से काबिज लोगों को ही पहुंचाने के लिए एक बड़ा खेल खेला। इन अफसरों व क्लर्कों ने मिलीभगत कर नगर परिषद की रसीदें फर्जी तरीके से कब्जेधारियों के नाम काटकर खुद ही लीज बढ़ा दी और बाद में सुबूत मिटाने के लिए उन बुकों को ही गायब कर दिया गया, जिनमें से रसीदें काटी गई।
शिकायत होने पर जब पूर्व डीसी ने इस मामले की जांच करने के आदेश दिए तो ये बात सामने आई कि जिन बुकों से संबंधित रसीदें काटी गई, वो बुकें तो नगर निगम कार्यालय से ही गायब हो चुकी है। इसी तरह फर्जी रसीदें काटकर कुछ लीज संपत्तियों की फर्जी ढंग से म्यूटेशन भी कर दी गई। इसके लिए भी न तो इस्टेट अफसर से और न ही हरियाणा सरकार से कोई अनुमति ली गई।
किसने काटी रेंट की पर्चियां, कहां है रिकार्ड?
इस खेल में बिना सरकार और इस्टेट अफसर से अनुमति लिए करोड़ों रुपये की लीज संपत्तियों को महज कुछ सैंकडों रुपयों में ही कब्जेधारियों को फर्जी तरीके से लीज रेंट पर दे दिया गया और बाद में रिकार्ड गायब कर दिया गया। जांच के दौरान सामने आए तथ्यों में यह खुलासा हुआ है
कि कैंट में एक करोड़ों की लीज संपत्ति को बिना सरकारी व प्रशासनिक अनुमति के महज 1620 रुपये सालाना रेंट पर 7 साल के लिए एक कब्जेधारी को दे दिया गया।
जबकि एक अन्य मामले में करीबन चार एकड़ लीज लैंड को महज 814 रुपये सालाना किराए पर कब्जेधारी के हवाले कर दिया गया। इन लीज संपत्तियों की नगर निगम में रसीदें किसने काटी और जिस बुक से ये रसीदें कटी, वो रिकार्ड कहां है? आज तक नगर निगम के अफसरों को इसकी जानकारी नहीं है।
आला अफसरों को भी करवाया धांधली से अवगत
सरकारी लीज संपत्तियों में हुई धांधली से नगर निगम के पूर्व निगम आयुक्त शहरी स्थानीय निकाय विभाग हरियाणा सरकार के प्रधान सचिव को पत्र लिखकर अवगत करवा चुके हैं। इस पत्र में उन्होंने आला अफसर को साफ लिखा है कि कुछ लीज संपत्तियों की अवधि 31 मई 1976 के बाद नहीं बढ़ाई गई है। जिसमें सरकारी लीज लैंड सर्वे नंबर 164-सी व 164-डी भी शामिल है। लेकिन फिर भी निगम के कर्मचारी व अधिकारी ने इन लीज संपत्तियों की रसीदें जारी कर दी। आयुक्त ने लिख है कि अभी तक इन कर्मचारियों की पहचान नहीं हो पाई है। जिस वजह से अभी तक इन कर्मचारी व अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही अमल में नहीं लाई गई है।
पुराने मामले की जांच चल रही है
लीज संपत्तियों का सारा रिकार्ड फिलहाल डीसी कार्यलय के अंतर्गत कर दिया गया है, क्योंकि डीसी ही इन संपत्तियों के इस्टेट अफसर है। दूसरा, लीज संपत्तियों के मौजूद स्टेट्स पर नगर निगम अब पूरी तरह से सख्त और अर्लट है। पुराने मामलों की जांच अभी चल रही है।