बदांयू कटिहार का रहने वाला परिवार पांच साल पहले रोजी रोटी कमाने के लिए पंजाब के लुधियाना में आ बसा। लखीराम ने बताया कि पहले सब सामान्य चल रहा था। लेकिन लॉकडाउन के बाद लोग अपना कारोबार छोड़कर घरों को जाने लगे, तो मैं भी अपनी बीबी व तीन बच्चों के साथ घर जाने के लिये निकल पड़ा। जैसे-तैसे कर पैदल अंबाला पहुंचा लेकिन यहां पुलिस ने रोककर धर्मशाला में ठहरा दिया। लखीराम की पत्नी सर्वेश ने बताया कि घर से रोज सास और ससुर का फोन आता है कि बेटा आप कुशल तो हो, कहां पहुंचे हो, कहां रह रहे हो, खाना खाया या नहीं खाया, इन सब सवालों के दौरान बूढ़ी आंखों में आंसू आ जाते थे। कहते थे, हमारे पोते पोतियों का ध्यान रखना, जल्दी घर आ जाना, यहीं रह कर दो रोटी रूखी सूखी मिल बांटकर खा लेंगे। जिसे सुन कई बार तो लगता था यहां से कैसे भी करके जल्द जाएं। लेकिन एक तरफ कोरोना महामारी और दूसरी तरफ पुलिस का सख्त पहरा है जिस कारण ऐसा नहीं कर सकते थे। लेकिन जब प्रशासन द्वारा घर भेजने की जानकारी मिली तो सुनकर आंखों से खुशी के आंसू निकलने लगे। उन्होंने बताया कि अंबाला प्रशासन ने भी उनका पूरा ध्यान रखा। साथ ही कहा कि यह 28 दिन हमें जिंदगी भर याद रहेंगे।