तर्कशील सोसायटी के अंबाला इकाई के प्रधान सतीश बहादुर का देहांत हो गया। उन्होंने सवेरे 11 बजे अंतिम सांस ली। सतीश ने 2003 में मेडिकल खोज के लिए देह दान करने का एलान किया था। इसी वजह से उनका शव चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित मेडिकल कॉलेज के हवाले कर दिया गया। उत्तरप्रदेश के बिठूर में जन्में सतीश बहादुर 1990 से तर्कशील सोसायटी के प्रधान थे। सोसायटी के महासचिव गुरमीत सिंह ने बताया कि वे अपने पीछे दो लड़कियों एंव दो लड़कों को छोड़ गए हैं। सतीश बहादुर तर्कशील आंदोलन में जुड़ने से पूर्व रेलवे वर्कर्स यूनियन में राष्ट्रीय स्तर के महासचिव रहे। उन्होंने रेलवे यूनियन में मुगलसराय में वर्करज का नेतृत्व किया और जार्ज फर्नांडीज के साथ 1974 की रेलवे की देश व्यापी हड़ताल में भाग लिया। मुगलसराय में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी तो कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें लोक सभा का चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा लेकिन कर्मचारियो के हित मे काम करने के लक्ष्य पर वे द्र्ढ रहे। 1974 की रेलवे हड़ताल में अपनी भागीदारी के कारण नौकरी से निकाल दिए गए। फिर मधु दंडवते के रेल मंत्री बनने पर उन्हें बहाली मिली लेकिन इस शर्त के साथ कि उन्हें मुगल सराए छोड़ना होगा और इस प्रकार 1976 में वे रेलवे की कालका वर्कशॉप में मकेनिक पद पर लगे। जहां से 1978 में अंबाला में स्थांतरित हुए और 1987 में यहीं से रिटायर हुए। उन्होंने रूस, नाइजीरिया का दौरा भी किया। नाइजीरिया में वे राइट्स कंपनी की तरफ से गए थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने तर्कशील आंदोलन में बेहद सक्रियता से काम किया। अपने जीवन में पीयूसीएल से भी जुड़े रहे एंव मानव अधिकारों को लेकर जस्टिस वीएन तारकुंडे के साथ काम किया। शोर प्रदूषण को लेकर वे लगातार आरटीआई लगाते रहते थे। अंबाला में प्रशासन को उन्होंने लगातार ज्ञापन देकर शोर प्रदूषण पर ध्यान आकर्षित किया। अंधविश्वास विरोधी मुहिम में वह सदा सक्रिय रहे और अंतिम समय तक तर्कशील कार्यो को समर्पित रहे।