अंबाला सिटी। समुद्र मंथन के समय सभी देवता अमृत के आकांक्षी थे। उस दौरान भगवान शिव के हिस्से में भयंकर हलाहल विष आया। भगवान ने बड़ी सहजता से सारे संसार को समाप्त करने में सक्षम उस विष को अपने कंठ में धारण किया। इसके बाद भगवान श्री महादेव नीलकंठ कहलाए। यह सद्विचार सिटी के सेक्टर सात स्थित श्री नीलकंठ महादेव मंदिर में चल रही कथा में पुजारी पंडित भगवती प्रसाद शास्त्री ने कहे। रविवार को मंदिर में चल रहे सवा करोड़ ओम नम: शिवाय मंत्र जाप में 100 परिवारों के सदस्यों ने हिस्सेदारी ली। मंदिर के पुजारी पंडित भगवती प्रसाद शास्त्री ने बताया कि सुबह करीब छह बजे सर्वप्रथम भगवान भोलेनाथ जी के दरबार में शिवलिंग पर भक्त अशोक जिंदल के परिवार ने रुद्राभिषेक किया। इसमें मंदिर के पंडितों ने मंत्रोच्चारण कर विधिपूर्वक पूजा अर्चना करवाई।
इस दौरान पंडित भगवती प्रसाद ने शिव महापुराण की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि शिवलिंग की पूजा करने का विशेष महत्व है। शिव महापुराण में कहा गया है कि शिव को संसार की उत्पत्ति का कारण और परब्रह्म कहा गया है। भगवान शिव ही पूर्ण पुरुष और निराकार ब्रह्म हैं। इसी के प्रतीकात्मक रूप में शिवलिंग की पूजा की जाती है। भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। तभी से शिव को परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में लिंग की पूजा आरंभ हुई। पंडित भगवती प्रसाद ने कहा कि कार्यक्रम के समापन पर सभी भक्तों ने भगवान भोलेनाथ जी की विशेष आरती की।